बैंकमोड़ चौराहा (धनबाद) : शायद आप सोचे भी नहीं होंगे की धनबाद शहर में वासेपुर और सरायढ़ेला (स्टील गेट) के बीच, जहाँ दशकों से छत्तीस का आंकड़ा बना रहा, आज भी हैं, लगभग 10 किलोमीटर के क्षेत्रफल में महात्मा गांधी की सिर्फ दो प्रतिमाएं हैं - एक: गांधी सेवा सदन, हीरापुर में और दो: लुबी सर्कुलर रोड पर आयकर भवन के पास। इन दो स्थानों पर गांधी को उनके जन्मदिन और मृत्यु दिवस को स्थानीय लोग, जो आज भी गांधी की 'दम तोड़ती विचारधारा' को दांत से पकडे हैं, अथवा स्थानीय प्रशासन के अधिकारीगण उपस्थित होकर गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं। दो मिनट आंख बंदकर उन्हें याद करते हैं और उनके विचारों पर दो शब्द कहते भी हैं, ताकि अख़बारों में किसी कोने में प्रकाशित दो शब्दों के सहारे ही गांधी की बातें आज की पीढ़ियों तक पहुंचे।
शेष सम्पूर्ण शहरी क्षेत्र में, खासकर वासेपुर से लेकर सरायढ़ेला स्थित सिंह मैंशन, रघुकुल के बीच या तो कागज पर छपे गांधी की तस्वीर के लिए, या फिर जिस वस्तु से गांधी को धृणा थी, के लिए मारामारी है। हम बड़ा तो हम बड़ा, हम बाहुबली तो हम बाहुबली की प्रतियोगिता है। दुर्भाग्य यह है कि इसी होड़ में विगत कई दशकों से सैकड़ों 'निर्दोष' व्यक्ति अपने-अपने 'भैय्याजी' के लिए मृत्यु को प्राप्त किये। दोनों इलाकों में पुरुषों की संख्या उत्तरोत्तर कम होती गयी। महिलाएं विधवा होती गयी। बच्चे अनाथ होते गए। वृद्ध माता-पिता को जीते-जी अपने संतानों की अंतिम सांस गिनना पर रहा है। कई पुरुष तो इलाके से ऐसे भागे जो कभी वापस नहीं आये और स्थानीय पुलिस उन्हें 'मृत' घोषित कर दी।
और इस बीच मुंबई के बॉलीवुड के लोग यहाँ के अश्रुपूरित परिवारों की कथा-व्यथा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा घरों के पर्दों पर बेचकर मालामाल हो रहे हैं। नमक-मिर्च लगाना बॉलीवुड वालों की फितरत है। दर्शकों की तो बात ही नहीं करें। विगत वर्षों में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर लगभग 70 करोड़ से अधिक कागज पर प्रकाशित गांधी को बटोरा 'वासेपुर के भूगोल, इतिहास, गणित' ज्यामिति' को बेचकर । दुर्भाग्य यह है कि न तो उन सिनेमा के बनाने वाले या फिर उसमें काम करने वाले कलाकार वासेपुर मोहल्ले की गलियों को जानते हैं, मृतक के परिवारों को जानते हैं, विधवाओं को जानते हैं, अनाथ बच्चों को जानते हैं।
काश !! दो कदम पैदल चलकर उन अनाथ बच्चों की शिक्षा, उन विधवाओं की परवरिश के लिए भी कुछ उपाय करते। कुछ नहीं तो आकर 'ढाढ़स' ही बांधते। वैसे इस बात से इंकार भी नहीं कर सकते कि आने वाले समय में इन सिनेमा के निर्माताओं को, कलाकारों को सरकार की ओर से, चाहे राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार, पुरस्कार भी मिल जाय। कुछ भी हो सकता है। गांधी में बहुत ताकत है।
बहरहाल, चलिए चलते हैं अस्सी के कालखंड में। अस्सी के दशक में देर रात धनबाद रेलवे स्टेशन के सामने सड़क से कोई चार फ़ीट ऊँचे स्थान पर लाल लाल प्रज्वलित आँच के बगल में पालथी मारकर रामचरित्तर (राम चरित्र) बैठा होता था। गोरा-चिट्टा, गोल-मटोल शरीर, मुंह में पान और मीठी बोली के साथ धधकते आंच पर चाय उबालते रहता था। स्टेशन के पास दूकान होने के कारण चाय की सेवा चौबीसो-घंटे, सालों भर चलता था।हां, कुछ समय के लिए दूकान की गद्दी पर राम चरित्तर के सेवक बैठते थे। वे सभी ईमानदार थे। कागज पर प्रकाशित गांधी की छवि से उन्हें उतना ही प्रेम था जितना उनकी मेहनत से प्राप्त होता था। उनके लिए दूसरों के पैसे 'मिट्टी के बराबर' था। तभी तो रामचरित्तर गल्ले को उनके हवाले सुपुर्द कर बेफिक्र सोता था।

आवक जावक और ट्रेन से उतरने-चढ़ने वालों के अलावे देर रात हम अख़बार वाले चाय की चुस्की लेते जिले की राजनीति, आपराधिक गतिविधियां, जिला प्रशासन की विफलता, कोयले की चोरी, अवैध उगाही, कोयलांचल में अवैध गांजा, भांग, चरस, अफ़ीम, और एनी नारकोटिक्स पदार्थों की अवैध तस्करी, उस क्षेत्र में अपराधियों का आकर्षण बहुत तरह की बातों पर चर्चाएं करते थे रामचरित्तर की दूकान पर। इसकी दूकान के बगल में दो और दुकाने थीं, लेकिन रामचरित्तर की बात कुछ अलग थी। इस बीच कई बीडीओ साहब की गाड़ियाँ भी रुकती थी जो हम संवाददाताओं इ मिलना चाहते थे, अखबार में नाम चाहते थे।
सन 1956 में धनबाद को एक जिला के रूप में वजूद मिला। जिन बातों को लेकर यह इलाका विख्यात से कुख्यात हुआ, वह बात उन दिनों भी थी। लेकिन अंतर सिर्फ इतना था कि न तो कोयले जैसा काला लोगों की मानसिकता हुई थी और ना ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में भारतीय मुद्रा का मोल जमीन के अंदर गया था। उस समय भी कागज के टुकड़े पर प्रकाशित गांधी अमरीका, लन्दन, फ़्रांस, जर्मनी, जापान आदि देशों के मुद्राओं के सामने सर उठाये था। उसी समय धनबाद के पहले उपायुक्त बनकर आये शरण सिंह। इधर अविभाजित बिहार के सचिवालय और विधानसभा में बैठे सफ़ेद पोश लोगों का 'कागज पर प्रकाशित गांधी की तस्वीरों के प्रति जैसे जैसे लालच बढ़ता गया, धनबाद में उपायुक्तों का आने-जाने की क्रिया भी तीब्र होती गयी।
रामप्रकाश खन्ना, शिवराज नंदन शर्मा, सुरेन सिंह धानोबा, गुरुदेव सिंह ग्रेवाल, भगीरथ लाल दास, आरआर मेनन, आरआर प्रसाद, ए यु शर्मा, चंद्रमोहन झा, कुंवर बहादुर सक्सेना, लक्ष्मण शुक्ल, देवदास छोट राय, केडी सिन्हा, एस विजयराघवन, टी नंदकुमार, डॉ. जे एस बरारा, अशोक कुमार, एके उपाध्याय, मदनमोहन झा, रामसेवक शर्मा, अफ़ज़ल अमानुल्लाह, व्यासजी, अनिल कुमार, शिव बसंत, सुधीर कुमार, महावीर प्रसाद, इएलएसएन बाला प्रसाद, डॉ. प्रदीप कुमार, डॉ. बी राजेंद्र, मोहम्मद सनुल्लाह, विनोद किस्पोट्टा, नरसिंह उपाध्याय, डॉ. नितिन मदन कुलकर्णी, अजय कुमार सिंह, डॉ (श्रीमती) बीला राजेश, सुनील कुमार वर्णवाल, दीप्रवा लाकरा, प्रशांत कुमार, सुनील कुमार, कृपा नन्द झा, अंजनेयुलु दोड्डे, अमित कुमार, बालकिशुन मुंडा, उमाशंकर सिंह, संदीप सिंह, वरुण रंजन, सुश्री माधवी मिश्रा जैसे अधिकारी धनबाद के उपायुक्त के कार्यालय में आते गए, बैठते गए और जाते गए।
अभी आदित्य रंजन धनबाद के 54 वे उपयुक्त के रूप में सेवारत हैं। धनबाद को जिला बनने के अब विगत 69 वर्षों में 54 उपायुक्तों का आना-जाना सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टियों, नेताओं, कार्मिक विभाग और मुख्यमंत्री कार्यालय के नियत को भी उजागर करता हैं। औसतन 15 माह की सेवा अवधि में एक उपायुक्त क्या कर सकता है यह तो वही बता सकते हैं। और सबसे बड़ी बात तो यह कि अपवाद को छोड़कर सभी उपायुक्त छपास रोग से सभी ग्रसित थे।
उन दिनों प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जीवित थी जब धनबाद आना-जाना प्रारम्भ हुआ था कहानी के लिए। उस कालखंड में अशोक कुमार धनबाद के उपायुक्त थे। लेकिन उनके ही कार्यकाल में श्रीमती गांधी की हत्या हुई और धनबाद शहर भी दंगाइयों से अछूता नहीं रहा। परिणामस्वरूप 11 जून, 1985 को अशोक कुमार को धनबाद को नमस्कार करना पड़ा। उधर पटना में राजनीतिक माहौल भी गर्म हो रहा था। पटना का राजभवन दिल्ली में बैठे नेताओं के साथ हॉटलाइन पर जुड़ा था। आठवें विधानसभा में चंद्रशेखर सिंह एक वर्ष 210 दिनों के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हुए और फिर नवमीं विधानसभा के गठन का समय आ गया। इस विधानसभा में 12 मार्च 1985 को कोयलांचल के श्रमिक नेता बिंदेश्वरी दुबे मुख्यमंत्री कार्यालय में आये । दुबे जी के आगमन के साथ ही एके उपाध्याय 12 जून 1985 को धनबाद के उपायुक्त बने जो मई 19, 1986 तक रहे।

नवमीं विधानसभा के कालखंड में पटना में चार मुख्यमंत्री - बिंदेश्वरी दुबे, भागवत झा 'आज़ाद', सत्येंद्र नारायण सिन्हा, और जगन्नाथ मिश्र - बने। सभी कोयलांचल से अवगत थे। सबों की पकड़ थी कोयलांचल में। स्वाभाविक भी था। सत्ता चलाने के लिए बाहुबली और पैसों की जरुरत होती थी और धनबाद इन गुणों से परिपूर्ण था, और आज भी है । फिर 20 मई 1986 को अवतरित हुए मदन मोहन झा उपायुक्त के रूप में। वैसे लोग कहते हैं कि मदन मोहन झा धनबाद में कोयला माफिआओं की कमर तोड़ने में अपनी भूमिका निभाए, लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि वे भी अख़बारों में, पत्रिकाओं में, टीवी पर छपने, दिखने वाले रोग से ग्रसित थे। मदन मोहन झा धनबाद के 20 वें उपायुक्त थे। तबसे लेकर आज तक 34 उपायुक्त आये और गए लेकिन धनबाद की छवि को दुरुस्त करने में कोई अपना हस्ताक्षर नहीं कर सके, सिवाय अफजल अमानुल्लाह के (अगर माने तो) जो सरकारी आदेश के बाद भी लालकृष्ण आडवाणी को धनबाद में नहीं रोके, गिरफ्तार नहीं किये - शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए। खैर।
धनबाद से प्रकाशित स्थानीय अखबारों की तो बात ही नहीं करें, कलकत्ता और पटना से प्रकाशित अखबारों के नुमाइंदों को दामाद जैसा रखते थे उन दिनों धनबाद में पदस्थापित उपायुक्त महोदयगण ताकि अखबार में नाम प्रकाशित होता रहे। आखिर अखबार में नाम छपना, फोटो प्रकाशित होना किसे खराब लगेगा। वैसी स्थिति में बीडीओ या डीडीसी को कौन पूछता है। कभी-कभी इस कारण भी रामचरित्तर की दुकान पर चाय पीने के बहाने एकत्रित होते थे। उन अधिकारियों के आने से एक फायदा यह भी होता था कि ब्लॉक के अधिकारियों का, कर्मचारियों का स्थानीय अपराधियों के गिरोहों के क्रियाकलापों के बारे में अच्छी जानकारी होती थी। और हम संवाददाताओं को और क्या चाहिए ।
अभी जिस स्थान पर बैठा हूँ, मेरे सामने से स्टेशन से आने वाली सड़क उपरगामी पथ नीचे उतर रहा है। यहाँ से बायें का रास्ता पुराना बाजार, पानी टंकी की ओर जाता जाता है। जबकि दाहिने जाने वाला रास्ता कतरास की ओर जाता है। इसी बीच से एक रास्ता पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री दरबारा सिंह के पुत्र के होटल स्काई लार्क के रास्ते झरिया की ओर जाता है। इस ऊपरगामी पथ पर चढ़ने से पहले बाएं तरफ से नीचे का रास्ता कोई आधा किलोमीटर के बाद वासेपुर के रास्ते भूली टाउनशिप की ओर जाता है। अगर भूगोल से देखें तो वासेपुर का इलाका, जिसे गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के नाम से सिनेमा के निर्माता क़रीब 70+ करोड़ से अधिक गांधी के चित्र वाले कागज को बटोरा, महज़ दो किलोमीटर क्षेत्रफल में फैला है। इस क्षेत्र में दर्जनों गलियाँ हैं। उन दिनों तो इस इलाके में इतने मकान और बाज़ार नहीं थे, आज भरे पड़े हैं। उन दिनों पढ़ने के लिए विद्यालय या निजी शैक्षिक संस्थान भी नहीं थे, आज तो पूछिये ही नहीं।
वैसे लेखक और विश्लेषक जो भी कहें, अखबार में, पत्रिका में, सिनेमा में जो भी लिखें, दिखायें, हकीकत यह थी कि न उन दिनों स्थानीय लोगों को अपराधियों की गतिविधियों से कोई फर्क पड़ता था और न आज पड़ता है। हाँ, रोज़मर्रे की ज़िन्दगी में थोड़ी बहुत खलल होती थी, लेकिन वह उन्ही लोगों को प्रभावित करती थी जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते थे। हाँ, सबसे अधिक प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर पड़ा था। बच्चे विद्यालय जाने से डरते थे। लेकिन आज परिस्थिति बदल चुकी हैं।

अख़बारवाला से बात करते धनबाद के पुलिस अधीक्षक कहते हैं: "शिक्षा ही परिवर्तन का मार्ग निकालता है। हमारी कोशिश जारी है और रहेगी की जिला के हर बच्चों को विद्यालय तक पहुँचने के मार्ग में कोई बाधा नहीं हो। सभी बच्चे, चाहे समाज के किसी भी तबके के हों, शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। विगत कई विद्यालयों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में मैं छात्र छात्राओं से निवेदन किया हूँ कि वे पढ़ने के लिए आगे आएं। जिस दिन वासेपुर के इलाके में अपराधियों की गतिविधि बढ़ी, वह कल की बात थी। उन बातों से समाज पर, बच्चों पर विशेष प्रभाव पड़ा था। लेकिन आज समय बदल रहा रह। आज प्रशासन के साथ साथ समाज के लोग भी सतर्क और संवेदनशील हैं, खासकर अपने परिवार और बच्चों के प्रति। इसलिए मैं बच्चों से बारम्बार कहता हूँ कि आप सभी पढ़ें, अव्वल आएं, जिला में, प्रदेश में, देश में और विदेश में अपना परचम लहरायें। लेकिन यह तभी संभव है जब आप पढ़ेंगे।”
पुलिस अधीक्षक का कहना है की 26 अक्टूबर 1956 को जिला बना। जिले के निर्माण के बाद उसे भी बहुत यातनाओं से गुजरना पड़ा। हम जैसे सैकड़ों अधिकारी आए और गए। लेकिन जो यहां के हैं, जिन्हें यहाँ रहना है, उन्हें अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए स्वयं भी सोचना होगा की वे अपराधी बनने का मार्ग पकड़े, अवैध गतिविधियों से पैसे कमायें, पकड़े जाने पर कारावास में जीवन बिताएं या फिर शिक्षित होकर अपनी पहचान बनायें। ख़ुशी की बात यह है कि आज बच्चों का, युवक युवतियों का मार्ग शिक्षा और शैक्षिक संस्थाओं की ओर है।
बहरहाल, एक रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदानें हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। वैसे कोयलांचल में सत्तर के दशक के उत्तरार्ध से सूर्यदेव सिंह के अंतिम साँस से कुछ पूर्व तक सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा था, लेकिन आज समय के बदलने के साथ साथ सूर्यदेव सिंह के चारों भाई भी मृत्यु को प्राप्त किए। और उनकी अगली पीढ़ी में आपसी मनमुटाव के कारण एकता खंडित ही नहीं सहस्त्र खंडों में टूट गई है। सभी अपने अपने गिरोह बना लिए है।
आइए चलते हैं वासेपुर
वर्ष 1983 मे फहीम खान के पिता शफीक खान की हत्या से शुरू हुआ वासेपुर का गैंगवार। सत्तर के कालखंड में वासेपुर सहित अन्य क्षेत्रों में शफीक खान का दबदबा प्रारम्भ हो गया था। पुलिस फाइल में आज भी यह बात उल्लिखित है कि वर्ष 1980 में शफीक खान के बड़े बेटे शमीम खान का झगडा नया बाजार के बाबला उर्फ अरशद से हुआ जो कालांतर में विकराल रूप ले लिए। इसका परिणाम यह हुआ कि लिया 1983 में शफीक खान की बारबाड्डा में गोली मारकर कर दी गई। इस हत्या का आरोप नया बाजार के सुल्तान पर लगा। शफीक खान की हत्या के बदले के रूप मे सुल्तान के भाई असगर की हत्या 1986 में बैंक मोड मे कर दी गई।
भाई के हत्या से बौखलाए सुल्तान ने शमीम के चाचा हफीज पर जानलेवा हमला किया परन्तु वह बच गया। जानलेवा हमलाकांड के आरोपी बने अंजार की हत्या भूली मोड के समीप कर दी गयी। इसी बीच एक मामले में पेशी के दौरान शमीम खान की हत्या हीरापुर स्थित जिला न्यायालय परिसर में सिपाहियों के सुरज्ञा व्यवस्था को धत्ता बताते हुए गोली मारकर हत्या कर दी गई। शमीम खान के हत्या के बाद फहीम खान ने मोर्चा संभाला लेकिन वर्ष 1995 के छोटे भाई छोटन खान की हत्या कर दी गई और लाश को लाइन किनारे फेक दिया गया। इस हत्या का आरोप सुल्तान पर लगा।

इसके बाद 12 जनवरी 1996 में सुल्तान की हत्या उसके घर में घुसकर कर दी गई और इस हत्या का आरोपी फहीम खान को बताया गया। सुल्तान की हत्या के बाद नया बाजार गुट का कमान नजीर उर्फ नजीरउद्दीन ने संभाला परन्तु 1998 को धनबाद रेलवे स्टेशन के समीप स्थित एक मजार मे घुसकर कर नजीर को मौत के घाट उतार दिया गया। इस घटना मे नजीक का अंगरज्ञक महबूब भी मारा गया हत्या का आरोप फहीम खान पर आया।
परन्तु नजीर के हत्या के बाद ही फहीम खान को उनके घर वासेपुर से ही चुनौती मिलनी शुरू हो गई फहीम खान के करीबी मुन्ना प्रेस वाला और साबिर आलम ने ही व्यवसाय मे लेनदेन के विवाद पर अलग मोर्चा खोल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 2001 को साबिर आलम पर जानलेवा हमला हुआ जिसमें साबिर बाल बाल बच गया और फहीम के घर पर हमला बोलकर मरहूम शमीम खान की वेवा शमा परवीन को गोली मार दी गयी। हालांकि शमा परवीन बच गई।
उसके बाद साबिर गूट के प्रमुख जफर की हत्या उसके घर पर ही कर दी गई इसमे भी फहीम खान को षड्यंत्रकारी बताया गया क्योंकि फहीम खान उस समय जेल मे था। जफर की हत्या के बाद 2001 को फहीम की मॉ नजमा खातुन और उसकी मौसी की हत्या पुराना बाजार डायमंड क्रासिंग समीप कर दी गई। इस हत्या का आरोप साबिर आलम पर लगा।
पुलिस रिकार्ड यह भी कहता है कि कुछ दिन मामला शांत रहा लेकिन 29 जनवरी 2004 रात के साढ़े दस बजे एके 47 से अपराधियों ने फहीम के ऊपर जानलेवा हमला किया। लेकिन फहीम बाल बाल बच गया। इस घटना मे फहीम का एक अंगरक्षक जहानाबाद के विनोद मारा गया जबकि लगभग आधा दर्जन लोग घायल हो गये। भागने के क्रम टोली से बेकारबांध के समीप पुलिस गश्ती दल की मुठभेड़ हो गई जिसमे एक अपराधी मारा गया और मौके पर पुलिस ने मोहम्मद अशफाक ओर मोहम्मद तनवीर को रंगे हाथ पकड़ लिया। फहीम खान के बयान के आधार पर बैंक मोड़ थाना मे वासेपुर गैंगवार के एक गुट के प्रमुख साबिर आलम पर आरोप लगाया गया।
वासेपुर और नया बाजार में छत्तीस का आंकड़ा
वासेपुर और नया बाजार गैंग में खूनी संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है। धनबाद के वासेपुर के कुख्यात शफीक खान की एक जमाने में बादशाहत थी। उसकी हत्या के बाद पुत्र फहीम और शमीम उसी अपराध के मार्ग पर चला। शमीम की भी हत्या हो गयी।फहीम हत्या के एक मामले में जमशेदपुर के घाघीडीह जेल में उम्र कैद काट रहा है। फहीम की बहन नासरीन वासेपुर में ही नासीर खान से ब्याही है। उसके चार बेटे हैं - प्रिंस, गोपी, गॉडविन और बंटी। इधर फहीम के भी तीन बेटे हैं - इकबाल, रज्जन और साहेबजादे । हाल के वर्षों मे फहीम के परिवार और नासीर के परिवार में काली कमाई में वर्चस्व को लेकर विवाद शुरू हुआ। फहीम और नासीर के बेटे एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए।
यहां हत्यायों के प्रतिशोध में कई हत्याएं हुई हैं। वर्ष 1990 और 2000 के दशक में फहीम खान पर कई हत्याओं के आरोप लगे। इन्हीं में से एक सागिर की हत्या के मामले में फहीम खान को जून 2011 में सजा हो गई।इसके बाद से वह जेल में ही है। उसे उम्रकैद की सजा सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखी है। फहीम खान के जेल जाते ही उनकी सल्तनत को बेटे इकबाल और प्रिंस के हाथों मे आ गई। दोनों ने डॉन की उसी सल्तनत को बरकरार रखा पर पैसे और रंगदारी के हिस्से को लेकर करीब ग्यारह सालों से फहीम खान और उसकी बहन तथा भांजे आमने-सामने हो गए। अब फहीम खान के लिए भांजा प्रिंस खान सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। भांजे प्रिंस ने कई बार वीडियो जारी कर फहीम खान को ललकारा है। मामा-भांजों की दुश्मनी में कई कारोबारियों को कोपभाजन का शिकार बनना पड़ रहा है। फहीम खान जमशेदपुर के घाघीडीह जेल में उम्रकैद काट रहा है। वासेपुर कमर मकदुमी रोड में उसका आवास है।
प्रिंस खान पर रंगदारी, हत्या और अपहरण के 91 मामले दर्ज हैं। इंटरपोल ने उसके खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस जारी किया है। इतना ही नहीं कई कारोबारी तो डर के मारे पलायन कर चुके हैं। कहते हैं प्रिंस दुबई से बैठ कर अभी भी झारखंड के व्यवसाईयों से रंगदारी वसूली अपने गुर्गो से करवा रहा है। छोटे सरकार उर्फ़ प्रिंस के आने के बाद वासेपुर में जंग का रंग थोड़ा बदल गया है। कोयला, लोहा और जमीन के लिए शुरू हुई जंग अब रंगदारी वसूली की जंग में तब्दील हो गई है।

वासेपुर को जानने वाले बताते हैं कि 80 के दशक में वासेपुर में रेलवे का लोहा और स्क्रैप के धंधे के लिए खून बहते थे।फहीम के फाइनेंसर माने जाने वालों से प्रिंस ने सबसे पहले रंगदारी मांगनी शुरू की है। मछली कारोबारी, ईस्ट बसुरिया के एक आउटसोर्सिंग संचालक के अलावा कई बड़े जमीन कारोबारी इस लिस्ट में शामिल हैं, जो फहीम खान के राजदार है।आलम यह है कि प्रिंस खान के दहशत के कारण धनबाद से कई बड़े व्यवसाई से लेकर उद्योगपति अपने कारोबार बंद कर पलायन कर चुके हैं। प्रिंस के जुबान पर बस एक ही शब्द गूंजता है "एक ही जान है अल्लाह ले ले या मोहल्ला."
80 के दशक के समय धनबाद के गैंग्स ऑफ वासेपुर में खौफ का दूसरा नाम बाबला था। उसके नाम से उस समय धनबाद में तूती बोलती थी। बाबला का नाम उस समय चर्चा में आया था जब 1983 में बरवाअड्डा स्थित पेट्रोल पंप के पास वासेपुर के डॉन और गैंगस्टर फहीम खान के पिता शफीक खान की हत्या कर दी गई थी। इस मामले में आरोप बाबला पर लगा था। जिसके बाद बाबला का नाम सुर्खियों में रहा था। लेकिन हाल के समय में बाबला अपराध की दुनिया से किनारा कर लिया था। वह वाहनों की एजेंटी और जमीन कारोबार कर अपना परिवार चला रहा है।
विगत चुनाव के समय बैंक मोड़ थाना क्षेत्र के नया बाजार में सोमवार की देर रात अपराधियों ने बाबला खान को गोली मार दी। स्थानीय लोगों ने बताया कि बाबला ने पैथ लैब परिसर में अपनी गाड़ी पार्क करने गया था। इस दौरान तीन अपराधी मौके पर पहुंचे। इनमें से एक अपराधी ने अन्य दो साथियों से बाबला की पहचान करायी। दोनों अपराधियों ने उसके ऊपर पिस्टल से हमला करना चाहा लेकिन बाबला और अपराधियों के बीच पिस्टल की छीना झपटी होने लगी। इसके बाद अपराधियों ने बबला के सिर पर पिस्तौल के बट से जोरदार हमला कर दिया, जिससे वह जमीन पर गिर गए और अपराधियों ने उन्हें गोली मार दी। गोली मारे जाने की घटना को लेकर बताया जाता है कि बाबला के घर के पास एक अपार्टमेंट बन रहा हैं। जिसमें उसकी भी कुछ जमीन है। इसी को लेकर दोनों ओर से मतभेद चल रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार जिस समय अपराधी बाबला को गोली मारी, उसके साथ लोगों की अपराधी से धक्का मुक्की भी हुई।

वासेपुर के बाहर भी हत्याएं हुई
धनबाद का आपराधिक इतिहास इस बात का गवाह है कि फॉरवर्ड ब्लॉक के संतोष सेनगुप्ता, आरजेडी के मुकुल देव, मजदूर नेता एस.के. राय इसी वासेपुर की धूल भरी गलियों में मृत पाए गए थे। गैंगस्टर समीन खान को धनबाद अदालत की देहरी पर गोली मार दी गई थी। सकल देव सिंह को बाइपास रोड पर मारा गया था जबकि उसके भाई की हत्या शक्ति चौक पर हुई थी। रेलवे ठेकव्दार इरफान और वार्ड कमिशनर नजीर अहमद भी इस खूनी खेल की भेंट चढ़े। 14 अप्रैल, 2000 को एमसीसी के विधायक गुरुदास चटर्जी को देवली के पास मार दिया गया।
कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था।
इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।
आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।
पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।

15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।
कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे।
21 मार्च 2017 की शाम को स्टीलगेट इलाके में हुई अंधाधुंध गोलीबारी करके पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह, चंद्रप्रकाश महतो, अशोक यादव और मुन्ना तिवारी की हत्या कर दी गई थी. इस मामले में कुल 11 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई थी। परन्तु विगत दिनों सभी आरोपी न्यायालय से बाइज्जत बरी हो गए।
धनबाद की काली, रक्तरंजित मिट्टी और बीपी सिन्हा
कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा @बीपी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। सिन्हा साहेब बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए।

उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। उनका इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी। लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी। घटनाओं की गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रहीं थी। ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चुका था उन दिनों यानी ए-आरा + बी-बलिया + सी-छपरा =डी धनबाद का नारा बुलंद हो चुका था।
कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है तब राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है, पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे।उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।
वे कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। किद्वान्ति है कि उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी। उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। समय का चक्र यहाँ भी चल रहा था। केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोड़ने के लिए मौके की तलाश में थी।
उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1979 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।
पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है।
क्रमशः ….
