नई दिल्ली: समय दूर नहीं है जब कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन द्वारा एक प्रश्न पूछा जायेगा कि 'दिल्ली में राजपथ का नाम 'कर्तव्य पथ' बदलने के पीछे की कहानी क्या है? यह भी पूछा जा सकता है कि पुलिस के पास 'शिकायत' (Complaint) और प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में क्या अंतर है या फिर किस प्रदेश में 'भैंसों' की खोज करने के क्रम में प्रदेश के तीन पुलिसकर्मी 'निलंबित' हुए थे या फिर दिल्ली सल्तनत में सबसे पहले प्रथम सूचना रिपोर्ट किसके लिए दर्ज किया गया था?
अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए कहानी करने के क्रम में कल जब 'बा' के नाम से अलंकृत कस्तूरबा गांधी मार्ग पश्चिमी छोड़ पर स्थित चाय की दूकान पर चाय की चुस्की ले रहा था, एक नब्बे बसंत का साक्षात्कार किये तंदुस्त वृद्ध बदल में आकर बैठे। हाथ में एक लाठी और कंधे पर द्वितीय वस्त्र (गमछी) लिए वृद्ध मेरी ओर कुछ क्षण देखकर पूछते हैं: "आप पत्रकार हैं ?"
आम तौर पर दिल्ली सल्तनत में कोई भी अनजान व्यक्ति जब पहचान पूछते हैं तो पहले मन ही मन 'प्राणायाम' करने लगता हूँ जवाब देने से पूर्व । यह समझ पाना बहुत मुश्किल होता है कि प्रश्नकर्ता किस उद्देश्य से प्रश्न कर रहा है ? वजह यह है कि विगत दो दशकों और अधिक समय में भारतीय पत्रकारिता का जो हश्र हुआ है उसे शब्दों में नहीं लिखा जा सकता। मैं तो 'पत्रकार' बाद में बना, पहले तो अखबार विक्रेता था, दिल्ली-पटना-कलकत्ता से प्रकाशित अख़बारों को पटना की सड़कों पर बेचा करता था, अख़बारों में प्रकाशित शब्दों के मोल को पिछले पांच दशकों से जानता था, बेधड़क कहा: "जी, मैं संवाददाता हूँ।"
बुजुर्ग फिर प्रश्न ठोके।
पूछते हैं 'क्या आप बता सकते हैं कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राजपथ का नाम कर्तव्य पथ क्यों किये? किस व्यक्ति से प्रभावित होकर राजपथ का नाम कर्तव्य पथ किया गया ?'
मैं उनके प्रश्न को सहर्ष स्वीकारते कहा: "जब मैं अखबार बेचता था तब उस दिन के प्रातः संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित समाचारों को बड़े ही तन्मयता के साथ पहले कुछ क्षण पढ़ लेता था और उन्हीं समाचारों में से दो-तीन समाचारों को सुबह-सवेरे शांत सड़कों पर सन्नाटा को चीरते हुए आवाज लगता था। सड़क पर चलने वाले, सुबह-सवेरे ताजा हवा खाने वाले, व्यायाम करने वाले लोग मुझसे ही अखबार खरीदने लगे। यह समाचार का विपरण था।"
बुजुर्ग मेरी ओर टकटकी निगाहों से देख रहे थे। फिर कहते हैं: 'यह तो मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ।"
मैं फिर सहर्ष स्वीकारते कहा: 'बिलकुल नहीं', मैं तो महज एक इशारा किया हूँ आपके प्रश्न के उत्तर की उत्पत्ति का।
बुजुर्ग फिर कहते हैं 'कैसे'?
मैं चाय की चुस्की लेते उनसे कहा कि मध्य दिल्ली में पांच ऐसी सड़कें हैं जिसका कौटिल्य यानी चाणक्य के नाम और उनकी नीतियों के आधार पर अंकित हैं। पहले 'चाणक्यपुरी' और फिर उनके पांच सिद्धांतों - शांति (पथ), न्याय (पथ, विनय (पथ), सत्य (मार्ग) और नीति (मार्ग) अंकित हैं।
आज़ाद भारत के चौथे वर्ष में यानी सं 1951 में चाणक्य के नाम पर 'चाणक्यपुरी' बना और फिर उनके सिद्धांतों पर सड़कों का नाम अंकित हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू चाणक्य के सिंद्धान्तों का भले देश की आर्थिक, राजनितिक, सांस्कृतिक क्षेत्रों में प्रयोग किये हों अथवा नहीं, लेकिन 'नाम की राजनीति' सन 1951 में प्रारम्भ हो गयी थी।
अब जहाँ तक आपके प्रश्न का उत्तर है 'देश के मतदाताओं की मानसिक स्थिति के साथ मनोवैज्ञानिक रूप से खेलना या फिर उसका वशीकरण करना, आज के राजनीतिज्ञ भली भांति जानते हैं। कल का 'किंग्सवे' पहले 'राजपथ' बना और समयांतराल 'कर्तव्य पथ।' अगर लोगों को 'कर्तव्य बोध' होता तो संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी की संख्या राजपथ काल में 303 से कर्तव्य पथ के काल में 240 नहीं होती।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के मतदाताओं को, लोगों को उनके कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने 'राजपथ' का नाम 'कर्तव्य पथ' कर दिये और 'रेस कोर्स रोड' को 'कल्याण मार्ग।'
लेकिन नाम बदलने से क्या होगा ? जिस चाणक्यपुरी और वहां स्थित सड़कों का नाम 'चाणक्य और उनकी नीतियों' पर है, क्या आज़ादी के 77 वर्षों में देश की बात रहने दें, उस क्षेत्र में वे सभी बातें 'अमल' में हैं क्या? क्या वहां 'न्याय' है? क्या वहां 'विनय' है? क्या वहां 'सत्य' है, क्या वहां 'नीति' है? शायद नहीं। 'शांति' इसलिए हैं कि उस इलाके में भारत का आम मतदाता नहीं रहता है, वह जोड़ से आवाज भी नहीं लगा सकता है, वंचित है। 'कर्तव्य पथ' की बात भी कुछ उसी तरह की है।
बुजुर्ग को अब तक मेरी पत्रकारिता पर कोई शक नहीं लग रहा था यह बात उनकी आँखों में दिख रही थी।
तभी मैं फिर कहा कि भारत का भूक्षेत्र लगभग 32,87,263 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ लगभग 1,46,145 किलोमीटर लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग है। कोई 1,79,535 राज्य राजमार्ग है और 63,45,403 किलोमीटर अन्य सड़कें हैं। अब अगर अंग्रेजी हुकूमत काल में क्वीन विक्टोरिया के तीसरे पुत्र ड्यूक ऑफ़ कनॉट द्वारा सन 1921 में शिलान्यास किये गए, अंग्रेजी वास्तुकार सर एडविन लुट्येन्स द्वारा रचित और 1931 में तत्कालीन भारतीयों को समर्पित हुए इण्डिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक की तीन किलोमीटर की दूरी वाली सड़क का नाम कर्तव्य पथ कर दिया गया तो इससे क्या हुआ?
राष्ट्रपति भवन का निर्माण कार्य भी अंग्रेजी हुकूमत काल में 1912 में प्रारम्भ हुआ था। कुल सत्रह वर्ष लगा था इसके निर्माण में जब 1929 में इसका निर्माण समाप्त हुआ और 1931 में इसे समर्पित किया गया। यह भवन भी सर एडविन लुट्येन्स और हार्बर्ट बार्कर द्वारा रचित है। सवाल यह है कि "क्या तीन किलोमीटर दूरी का नाम जो इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक जाती है, का नाम कर्तव्य पथ रखने से हम किसे कर्तव्य बोध करना चाहते हैं?
यहाँ तो देश का मतदाता स्वेच्छा से प्रवेश भी नहीं कर सकता और जो बेहिचक विजय चौक के रास्ते भारत के संसद में आवक-जावक करते हैं, उन्हें अगर कर्तव्य बोध हो जाये तो भारत विश्व का सबसे मजबूत देश हो जायेगा। आज हालात यह है की संसद में बैठने वाले या राष्ट्रपति/उप-राष्ट्रपति भवन में बैठने वाले सम्मानित गणमान्यों को अपने-अपने राजनीतिक पार्टियों के नेता का नाम जपने से फुर्सत ही नहीं है। प्रत्येक पांच शब्द में चार शब्द गुणगान को समर्पित होता है।" मेरे शब्द सुनकर बुजुर्ग उठे और अपना हाथ मेरे सर पर रखते कहते हैं "देश को पत्रकार नहीं अखबारवाला चाहिए।"
बहरहाल, आम तौर पर भारत में लोग बोल चाल की भाषा में 'शिकायत' और 'प्रथम सूचना रिपोर्ट' को एक ही मानते हैं। ग्रामीण इलाकों की तो बात ही अलग है। वहां सीधा कह देते हैं, पूछ लेते हैं 'FIR' (प्रथम सूचना रिपोर्ट) कर दिए या नहीं? ग्रामीण क्षेत्रों के अलावे शहरी क्षेत्रों में भी औसतन लोग दोनों में अंतर नहीं समझते।
जब इण्डियन एक्सप्रेस में 'अपराध का संवाददाता था, फिर बाद में निचली अदालत और दिल्ली उच्च न्यायालय देखने लगा (नब्बे के दशक में) तो न्यायालय के तत्कालीन दंडाधिकारी से लेकर उच्च न्यायालय के सम्मानित न्यायमूर्ति तक हम सभी कचहरी को देखने वाले संवाददाताओं को सलाह देते थे कि वे भारतीय दंड संहिता के साथ साथ आपराधिक प्रक्रिया अधिनियम या अन्य कानूनों की धाराओं को, जिसका इस्तेमाल न्यायालय में अधिक होता हैं, पढ़ लिया करें। उनका कहना था कि इससे न केवल संवाद लिखने में मदद मिलेगी, बल्कि बहस के दौरान समझने में भी मदद होगी।
आपको शायद याद भी होगा कि जब समाजवादी पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश में थी तब समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता की सात भैंसे गायब हो गयी। नेताजी उस समय मंत्रिमंडल में वरिष्ठ मंत्री थे। सत्ता में रहें और भैंस गायब हो जाए, फिर उथल-पुथल तो होगी ही। रामपुर से लेकर लखनऊ तक सरकारी अमला हिल गया। धन्यवाद के पात्र थे तत्कालीन पुलिसकर्मी जो अथक परिश्रम के बाद उन सात भैंसों को एक-एक कर बरामद कर मंत्री के तबेले में वापस ले तो आये। लेकिन तीन पुलिस कर्मियों के ऊपर गाज गिरी। एक चौकी इंचार्ज और दो कांस्टेबल निलंबित भी हुए। कुछ दिन बाद, लखीमपुर खीरी में एक राजनीतिक पार्टी के नेता की भैंस चोरी हुई तो पुलिस ने रिपोर्ट लिखी ही नहीं।
बहरहाल, शायद दिल्ली में रहने वाले लगभग साढ़े तीन करोड़ लोगों के साथ-साथ गुरुग्राम, नोयडा, फरीदाबाद और गाजियाबाद क्षेत्र सहित आज की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को मालूम नहीं होगा कि आज से 163-वर्ष पहले, यानी 1861 में जब दक्षिणी दिल्ली की #मेहरौली पुलिस स्टेशन की स्थापना हुई थी, उस कालखंड में श्रीमान #गणेशीलाल साहब की तीन भैंसे गायब हो गयी थी। इस मामले में पहले तो श्रीमान गणेशी बाबू 'शिकायत' दर्ज किये, फिर बाद में मेहरौली पुलिस तीन भैंसों की चौरी के मामले से सम्बंधित "प्रथम सूचना रिपोर्ट' दर्ज की। इसके बाद खोजबीन हुआ। भैंसे मिली, वापस खटाल पहुंची और अंत में मामला रफा-दफा हुआ। कहते हैं दिल्ली सल्तनत में यह पहला 'प्रथम सूचना रिपोर्ट' दर्ज हुआ था।