पटना/नई दिल्ली: साठ-सत्तर के दशक के उत्तरार्ध पटना में जहाँ खजांची रोड बारी पथ से मिलकर अपना अस्तित्व समाप्त करता था, बाएं हाथ नोवेल्टी कलर प्रिंटर्स के सामने से एक गली जाती थी दक्षिण की ओर। आज भी जाती ही होगी। क्योंकि भारत की गलियों में तो मतदाता ही रहते है। नेता, मंत्री, संत्री, अधिकारी तो बड़े-बड़े बगीचे वाले घरों में रहते है
इस गली नुक्कड़ से हाथ दाहिने यादव टिम्बर्स होता था। जहाँ प्रवेश द्वार के कोने पर प्रथम मंजिल पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का दफ्तर होता था। आज भी होगा। आज भले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे, सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद को याद नहीं हो वह छोटा सा कमरा, नीचे चाय की दूकान, मुकेश यादव, उनके पिता और छोटे भाई का वह विशाल परिसर, लेकिन आज भी इस दफ्तर के दीवारों को, वहां रखे मोठे-मोठे लकड़ियों को, तेज धार वाला लकड़ी काटने वाला मशीन को, याद है।
जो गली दक्षिण की ओर काजीपुर मोहल्ला होते आगे अंदर-ही-अंदर नालारोड से मिलती थी (आज भी होगी) पीपल के एक बृक्ष के नीचे वाले घर में एक बुढ़िया रहती थी। बुढ़िया विधवा थी लेकिन उसके पास सपत्ति की कमी नहीं थी। कहते हैं 'सम्पति से शक्ति आती' है। यह बात उन दिनों भी थी और आज तो है ही। तभी तो आज के नेता-अभिनेता लोगों की सेवा करने और संपत्ति एकत्रित करने का अनुपात 2:98 का अनुपात रखते हैं। उस रास्ते चलने वाले सभी यात्रियों को वह बुढ़िया गजब-गजब की गलियां देती थी। बच्चे उसका खूब मजाक उड़ाते थे और बड़े-बुजुर्ग गलियों में चलते-चलते गालियों का मजा लेते मुस्कुराते निकल जाते थे।
वजह यह था कि बुढ़िया के पास तीन-चार कित्ता मकान था। काजीपुर मोहल्ला में जमीन भी थी। जिसमें केचली-पानी एकत्रित था. मछलियां खूब होती थी। गोतिया लोग जानते थे कि इसके बाद उन सम्पत्तियों का मालिक वही होंगे - गालियां सुनने में कोई हर्ज नहीं है। कल अचानक उस बुढ़िया के साथ-साथ बिहार प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, लालू यादव, जगत प्रकाश नड्डा, जगन्नाथ मिश्रा, सुशिल मोदी,अश्विनी चौबे, रामावतार शास्त्री, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, भगवत झा आज़ाद सभी याद आ गए। बिहार के मतदाता याद आ गए। नीतीश कुमार भी दूसरे-दूसरे राजनीतिक पार्टियों को, नेताओं को खूब गलियाते रहे हैं, लेकिन जब भी 'फायदा' की बात देखते, 'जोंक' जैसा चिपक जाते हैं।
देखिये न कल तक 'ननकिरबा' के साथ थे, आज गुजरती कतभी पटना के एक पुराने मित्र से बात करने उनके मोबाईल पर घंटी टनटनाये यह जानने के लिए कि कहीं नितीश कुमार भी उसी बुढ़िया जैसा व्यवहार तो नहीं करने लगे हैं या फिर 'पलटी' मारने का पुनः अभ्यास तो नहीं कर रहे हैं। क्योंकि कुछ घंटे पूर्व कर्पूरी जी को भी स्वहित में राजनीतिक बाजार में बेच दिए प्रदेश के लोगों को पता भी नहीं चला, खासकर 'नाई' समुदाय के लोगों को, अत्यंत पिछड़े जाती के समुदाय को। ऐसा क्यों किये इस बात को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता होगा। वैसे जॉर्ज फर्नांडिस, शरद यादव और कई लोग तो बलि का बकरा बने ही।
आश्चर्य की बात तो यह है कि पत्रकार, संपादक लोग हुमचकर लिखे भी नहीं -प्रदेश के हित में, लोगों के हित में। दूसरे छोड़ पर जो महाशय थे, वे हंसते कहते हैं 'कौन पत्रकार है, कौन संपादक है झाजी अब। आपका जमाना गया। अब सभी लोग इंतजार में बैठे रहते हैं कि कब नेताजी उन पर आँख खोलेंगे" अब तो राम लल्ला का भी प्राण प्रतिष्ठा हो गया। राम लल्ला आँख खोल दिए हैं।"
मैं भी अपनी मूर्खता पर हंस दिया। क्योंकि बिहार के पत्रकारों और नेताओं में एक समानता गजब का है। बिहार के किसी भी जिले के पत्रकार जब प्रवासित होकर दिल्ली में पत्रकार बनते हैं या फिर जिले के नेता प्रदेश के रास्ते दिल्ली में नेता/मंत्री हो जाते हैं, अपने प्रदेश के लोगों को पहचानने में हिचकी लेने लगते हैं। खुदा-न-खास्ते अगर पहचान भी लेते हैं तो बतियाने का तेवर गजब का होता है।
बाबू रधुवंश प्रसाद सिंह को छोड़कर, जयप्रकाश आंदोलन के जितने भी बीज 'नेता' के रूप में राजनीति में अंकुरित हुए, उनमें यह अहंकार अधिक है। अपवाद: यदि आपसे उन्हें कोई काम नहीं है तो आप उनके लिए 'यूजलेस आइटम' हैं चाहे वर्तमान काल के लालू यादव हो, नितीश कुमार हों, सुशिल मोदी हो, अश्विनी चौबे हों, रविशंकर प्रसाद हों। ऐसी ही बातें पत्रकारों के साथ भी है जो ऊँची-ऊँची कुर्सियों पर बैठे हैं दिल्ली और मुंबई में । कई तो बात करते कान की खुदाई करने लगे, कई नाक में की खुदाई करने लगते हैं। मुझ जैसा मूर्ख भी समझ जाता है कि वे बात करना नहीं चाहते। इसमें कुछ 'अपवाद' हो सकता है, लेकिन स्थिति इससे बेहतर नहीं है।
यही कारण है कि आज भी हम पटना, लखनऊ, बनारस, कानपुर, नागपुर, मुंबई, कलकत्ता, धनबाद, आसनसोल, दुर्गापुर, अलीगढ़ आदि शहरों में रहने वाले पत्रकार मित्रों को कभी नहीं भुला जो अर्थे से गरीब हैं और आत्मा से महाराजा । जब भी कभी लिखने में समस्या समाधान की बात होती है तो उनके फोन की घंटी बजा देता हूँ और वे भी बहुत सम्मान से उसे स्वीकार करते हैं। कई बहुत श्रेष्ठ हैं, कई उम्र में अधिक हैं, कई समकालीन हउन्हीं जीवों में एक जीव हैं सम्मानित लव कुमार मिश्रा। कोई 54-वर्ष से अधिक समय से उनका गोल-ठोल, गोरा-चिट्टा, मूंछ वाला शिक्षित चकचकाता चेहरा आज भी जेहन में है। मैं उनके बराबर ज्ञानी तो नहीं हूँ, लेकिन अनपढ़, अशिक्षित लोगों को भी वे बहुत सम्मान करते हैं। मैं भाग्यशाली हूँ कि 38-वर्ष पहले रोजी-रोटी की तलाश में पाटलिपुत्र की धरती छोड़ने के बाद आज भी उन दिनों के लोग, मित्र मुझे बेपनाह सम्मान करते हैं, मोहब्बत करते है
पटना के लव कुमार मिश्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अब तक अपने नाम को छोटा नहीं किये हैं। मसलन लव कुमार मिश्रा' ही लिखते हैं। आजकल तो दू-गो कहानी मोहल्ला के अखबार में क्या छप गई, पत्रकार लोग 'कुमार' को 'मार' कर, 'क़तर' कर 'के' लिखने लगते हैं। 'उपनाम' को निरस्त कर 'गोत्र' लगा लेता हैं। लव कुमार मिश्र इतने बड़े पत्रकार होने के बाद भी सहायता मांगने वाले व्यक्ति को, चाहे पत्रकार ही क्यों न हों, 'ना' नहीं कहते। और उससे भी बड़ी विशेषता है कि 'वे फोन खुद उठाते हैं। किसी कारणवश नहीं उठा पाने पर 'वापस फोन' भी करते हैं और पूछते हैं 'हां ... फोन किया था आपने।"
फिर चर्चा होने लगी कि सत्तर के दशक में और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन काल में अश्विनी चौबे के पास आसमानी रंग का 'विजय सुपर' था, कभी-कभी के रिक्शा पर रोहतास के महाराज जैसे बैठकर पटना कॉलेज के सामने आते थे। सुशिल मोदी कैसे अपने हल्की पिले रंग के स्कूटर पर 'उलाड़' (टेढ़ा) बैठकर जबरदस्ती लोगों को हाथ-हिलाते (प्रणाम-प्रणाम) करते राजेंद्र नगर से अशोक राज पथ आते थे। साढ़े-पांच फुट का गोल-मटोल जगत प्रकाश नड्डा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को पटना विश्वविद्यालय में घूमते रहते थे। साथ में उनके सहपाठी दीपक भी रहता था। कैसे त्रिमुहानी में रहने वाले रविशंकर साईकिल से खजांची रोड के नुक्कड़ पर यादव टिम्बर के ऊपर विद्यार्थी परिषद् के कार्यालय में आकर राजनीतिक ज्ञान बांचते थे और संध्याकाळ तत्कालीन आर्यावर्त, इंडियन नेशन, सर्चलाइट, प्रदीप में क्या-क्या झूठ-सच का प्रेस विज्ञप्ति जायेगा, बनाते थे। जैसे सभी चेहरे, बातें सामने दौड़ने लगी।
फिर पत्रकारों के बारे में चर्चा होने लगी। कैसे तत्कालीन नगर विकास मंत्रालय के रमेश झा और हेमंत झा, तत्कालीन राजनेताओं के मिलीभगत से पत्रकारों को कंकड़बाग, टीवी टावर, कंकड़बाग, राजेंद्र नगर में आवास का, जमीन का आवंटन किया गया था। कैसे तत्कालीन अख़बारों के मूर्धन्य पत्रकार सब मंत्री-संतरे के पिछलग्गू बने थे। सभी बातें जैसे कल की ही लग रही थी। कई पत्रकार तो जमीन आवंटन के बाद उसे बेच भी दिए। उनके जमीन डाक्टर लोग ख़रीदे थे।
उन दिनों शिकडॉक्टर का 'व्यवसाय' विद्यालय, महाविद्यालय और अस्पतालों से निकलकर मोहल्ले में आ रहा था। दुकानें खुल रही थी। नेता लोगों का निवेश होना शुरू हो गया था। बेचारा मतदाता - कल भी पंक्तिबद्ध होकर अपने हाथों की पहली ऊँगली में कालिख लगा रहा था, आज भी वही काम कर रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिहार का मतदाता नितीश कुमार को कौन अधिकार दिया है कि वे एक राजनीतिक पार्टी को छोड़कर दूसरे पार्टी के साथ सरकार बना लें। यह तो मतदाता के मतों का पटना के डाक बंगला चौहरे पर खुलेआम हैं। फोन की घंटी बजी - नीतीश राज्यपाल को त्यागपत्र दे आये हैं। खेल खत्म नहीं, खेल की शुरुआत हो गयी।
तभी पटना से एक सज्जन लालू प्रसाद यादव के छोटका ननकिरबा का मुंह लटकर फोटो व्हाट्सएप किए। अब कैसे तेजस्वी यादव को कहा जाय कि 'महोदय !!! आपके पिता लालू यादव अपने घनघोर मित्र को पिछले पांच दशक और अधिक समय में पहचान नहीं सके, आप तो अभी ननकिरबा ही है। जितनी दूरी पटना से दिल्ली की है, उतनी ही लंबी नीतीश कुमार का अंतरी है। प्रदेश ही नहीं, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार की अंतरी पर शोध की जानी चाहिए।" खैर।
आज के लोग बाग़, खासकर पत्रकार बंधू-बांधव विश्वास नहीं करेंगे कि उन दिनों प्रदेश के चिटपुँजिया टाईप कुकुरमुत्तों जैसा पनपे नेताओं के बारे में तो सोचिये ही नहीं, बिहार सरकार के मंत्रिमंडल के ‘ठेंघुने कद के मंत्री से लेकर ‘आदम कद’ के मंत्री तक सप्ताह में दो दिन, कभी कभी तो तीन दिन भी फ़्रेज़र रोड पर बांकीपुर जेल (इसे केंद्रीय कारा भी कहते थे) के सामने आर्यावर्त-इण्डियन नेशन और बुद्धमार्ग स्थित सर्चलाइट और प्रदीप अख़बारों के दफ्तरों के मुख्य द्वार पर पहले संत्री को नमस्ते करके, वहां की भूमि को माथे पर लगाकर, तब अपना चरण-पादुका आगे बढ़ाते थे।
जानते हैं क्यों? उन अख़बारों में उनके बारे में, उनके मंत्रालय के बारे में कुछ प्रकाशित हो जाय। तूती बोलती थी उन अख़बारों का। अवपाद छोड़कर, उस ज़माने में पत्रकारों का ‘वजूद’ था और ‘नेता-अधिकारियों’ का भी वजूद था – दोनों एक दूसरे का सम्मान भी करते थे। पत्रकारों के कलम की ताकत को वे सभी सम्मान के सासत्तर-अस्सी के ज़माने के पत्रकारों की बात ही कुछ अलग थी। उन दिनों एक तो बहुत कम लोगों के पास वहां थी और जिनके पास वहां थी (अस्सी फीसदी दो पहिया स्कूटर/राजदूत मोटर साईकिल) उनके आगे PRESS लिखा देख पाठक का उनके प्रति जो सम्म्मान होता था, आज के लोग सोच नहीं सकते हैं। चाहे पटना का गाँधी मैदान हो, फ़्रेज़र रोड का चौराहा हो, बेली रोड हो, सर्कुलर रोड हो, सरपेंटाइन रोड हो उन पत्रकारों की बात ही अलग ...पटना के पत्रकारों ने, छायाकारों ने 'गर्दन में गमछी' सभ्यता की शुरुआत किये। बाद में दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई से आने वाले 'लब्ध प्रतिष्ठित' पत्रकार 'गमछी सभ्यता' को अपने-अपने गाँव-देश ले गए। उस गमछी सभ्यता में लव कुमार मिश्र (सर्चलाइट), दीनानाथ सिंह (इंडियन नेशन), मिथिलेश मोइत्रा (इंडियन नेशन), भाग्य नारायण झा (आर्यावर्त), राधेश्याम आचार्य (आर्यावर्त), छायाकार विक्रम कुमार, छायाकार कृष्ण मुरारी किशन, छायाकार कृष्ण मोहन शर्मा (जनशक्ति), छायाकार दीपक कुमार (माया), छायाकार पी के डे, छायाकार ए पी दूबे (हिंदुस्तान टाइम्स), राजीव कांत, अशोक कारण (हिंदुस्तान टाइम्स) प्रमुख थे। कभी-कभार सर्चलाइट के अमलेंदु, सत्य नारायण लाल, नर्मदेश्वर सिंह, मुक्ता किशोर, बालन जी, भुनेश्वर जी ये सभी भी इसी गमछी सभ्यता के अनुयायी हो जाते थे ।
चाहे बेली रोड से बुद्धमार्ग के रास्ते स्टेशन रोड आने की बात हो या आकाशवाणी पटना के नुक्कड़ पर यूनाइटेड न्यूज ऑफ़ इंडिया (यूएनआई) के दफ्तर, जो मैंगोलिआ बार के लिए भी प्रख्यात था, फ़्रेज़र रोड - डाक बांग्ला चौराहा होते स्टेशन की ओर आने की बात हो उन दिनों के पत्रकार पैदल चलने में हिचकिचाते नहीं थे। सभी युवक ही थे। ल;लव कुमार मिश्रा, अरुण रंजाब, अरुण सिन्हा, सुरेंद्र किशोर, मणिकांत ठाकुर, विकास झा सभी सडकों पर चप्पल घिसकर, कहानियों का इंट्रो बनाये थे। ये सभी पत्रकारिता के ऐसे स्तम्भी थे जिनका नाम भारत ही नहीं विश्व के अख़बारों में, पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। मैं चश्मदीद गवाह हूँ। खैर।
उस दिन शनिवार प्रदेश के एक उभरते नेता के लिए “उपहार” लेकर आया था। दिन था सन 1976 का शनिवार, 22 मई। बिहार के उस उभरते नेता की पत्नी के सबसे प्यारे भाई अपने एक मित्र के साथ बिहार के उस ज़माने के एक सबसे कम उम्र के पत्रकार के घर पहुंचे। पत्रकार बंधु पटना के गर्दनीबाग इलाके के सड़क संख्या 30 में एक सरकारी आवास में रहते थे। उन दिनों प्रदेश के सरकारी विभागों में कार्य करने वाले सभी कर्मचारी हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करते रहते थे कि उनके बाल-बच्चे, चाहे पुत्र हो या पुत्री, प्रदेश के पत्रकारिता में प्रवेश नहीं करे। वे अपने-अपने जीवन के अनुभव के आधार पर जानते थे कि आने वाले समय में प्रदेश ही नहीं, देश में पत्रकारिता का भविष्य गर्त में चला जायेगा।
पत्रकार नाम सुनते ही समाज, टोला-मोहल्ला के लोग उन्हें “शक” की निगाह से देखेगा। कोई पचास वर्ष पूर्व की वह सोच आज पटना ही नहीं, दिल्ली-कलकत्ता-मुंबई की सड़कों पर अखबार और टीवी चलाने वाले संस्थान के मालिक खुलेआम स्वीकार करते हैं।
लेकिन गर्दनीबाग सड़क संख्या 30 के उस सरकारी क़्वार्टर में रहने वाले कोई 40-किलो शारीरिक और 400 क्विंटल मानसिक वजन रखने वाला वह पत्रकार और उसके पिता – परिवार के लोग अपने विश्वास पर अडिग थे कि उनका बेटा आज ही नहीं, आने वाले समय में भारतीय पत्रकारिता में अपना हस्ताक्षर करेगा, भले अर्थ उस दिन भी नहीं हो; परन्तु मानसिक संपत्ति और संस्कार अपने उत्कर्ष पर होगा। उस पत्रकार का नाम है – लव कुमार मिश्र ।
लव बाबू का जन्म ननिहाल (हज़ारीबाग) में हुआ। उनके दादा सिमडेगा कालेज में संस्कृत के आध्यापक थे। प्रारंभिक शिक्षा भी हज़ारीबाग से ही शुरू हुई, परन्तु माध्यमिक शिक्षा सं 1970 में पटना के दयानन्द विद्यालय से किये और प्री-यूनिवर्सिटी पटना कालेज से। साल था 1973 और वे 155 रुपये 40 पैसे की तनख्वाह पर बुद्ध मार्ग से प्रकाशित सर्चलाइट अखबार में शिक्षा संवाददाता बन गए। उन दिनों सर्चलाइट अखबार में सप्ताह में एक पन्ने का “यूथ फोरम” निकलता था और लव बाबू उस एक पन्ने को लिख-लिखकर भर देते थे। उन दिनों आर्यावर्त में महेश शर्मा जी लिखते थे विश्वविद्यालय के समाचार और अंग्रेजी इण्डियन नेशन में बसंत मिश्रा। बसंत मिश्रा दिसंबर 1972 से लिखना प्रारम्भ किये।
वे पटनकालेज के भूगर्भ शास्त्र विभाग में प्राध्यापक भी बने। बंसन्त जी के पिता श्री राधा कांत मिश्रा (अब दिवंगत) इण्डियन नेशन अखबार में उप-संपादक भी थे। बसंत मिश्रा से पहले इण्डियन नेशन अखबार में शिक्षा से सम्बंधित ख़बरें फ़ैज़ान अहमद लिखा करते थे। फैज़ान साहेब जब यूएनआई में आ गए, फिर बंसन्त मिश्रा का जलबा दिखने लगा। उन दिनों बंसत मिश्रा – महेश शर्मा और लव कुमार मिश्रा का गजब का त्रिमूर्ति था। वजह भी था – तीनों विश्वविद्यालय संवाददाता ही थे। बाद में, सं 1980 में लव बाबू टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आ गए जहाँ वे कुल 36-वर्ष अपनी पत्रकारिता की सेवा अर्पित किये। पांच वर्ष पूर्व, सं 2016 में वे अवकाश प्राप्त किये।
लव कुमार मिश्रा ज़िन्दगी के सफर में आधी उम्र पत्रकारिता में रहते भारत भ्रमण किये, दर्जनों प्रदेशों के मुख्यालयों में पदस्थापित हुए, दर्जनों मुख्यमंत्रियों को उठते, बैठते, गिरते, जीते-मरते देखे, अपनी जिंदगी का अधिकांश समय सड़क यात्रा, ट्रेन यात्रा, हवाई यात्रा, समुद्र यात्रा में बिताये। आज भारत का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उन्हीं राजेनटोन की श्रृंखला में एक हैं। शब्दों का संकलन किये, संकलित शब्दों का विन्यास किये, शब्दों से घरौंदा से लेकर घर बनाये- कहानियां लिखे, कहानियां छपी। शब्दों में ‘दो वॉवेल’ लगाकर शब्दों को और जिसके बारे में लिख रहे हैं, कहाँ ‘उठाकर पटक’ देंगे, आज के पत्रकार नहीं समझ पाएंगे। विगत दिनों प्रधानमंत्री उन्हें फोन भी किये थे, हालचाल पूछे थे।
इस कहानी को लिखने के क्रम में वे कहते हैं : “पत्रकारिता के जीवन में विगत 50 वर्षों में अरब महासागर, बंगाल की खाड़ी के किनारे, मरुभूमि, जंगली क्षेत्र, बर्फीली और पहाड़ों, मसलन कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामाख्या तक नौकरी की। अब गंगा तट पर ही रहना है। पटना में ही रहना है। जहाँ पढ़ा – लिखा, जहाँ पत्रकारिता जीवन की शुरुआत किया, यहीं रहना चाहता हूँ। जीवन संघर्ष में ही बीता। अब खुद को भी आराम देना चाहता हूँ और शब्दों को भी। समाज में उत्थान की आशा करना हम जैसे पत्रकारों के लिए व्यर्थ है। समाज जिस गति से, देश की पत्रकारिता जिस गति से अधोमुख है, जिस गति से मानव-मूल्यों का पतन हो गया है, हो रहा है, हम – आप इसे रोक नहीं सकते। आज न तो ‘अनुशासित’, शब्दों के धनी, ऊँची सोच रखने वाले, समाज के बारे में सकारात्मक सोच रखने वाले पत्रकार हैं, और ना ही नेता तथा अधिकारी। आखिर सभी तो इसी समाज‘अक्सरहां लोग बाग़ पूछते हैं कि आप पांच दशक के करीब प्रदेश-देश की पत्रकारिता में गुजारे, क्या हासिल किये? ऐसे सवालों को सुनकर मन खिन्न नहीं होता, अलबत्ता, वर्तमान समाज और उस समाज में रहने वाले पढ़े-लिखे लोग, विद्वान-विदुषियों की सोच पर हंसी भी आती है। मन में तूफ़ान उठने लगता है। सोचने लगता हूँ की लोगों की सोच कितना दरिद्र हो गया है। इतनी दरिद्रता तो वास्तविक रूप से भी, आर्थिक रूप से भी प्रदेश में नहीं हैं। मुझे जो मिला, वे सभी आज ही नहीं, आने वाली पांच पीढ़ियां भी नहीं समझ पायेगी।'
आगे कहते हैं: 'हम कोई कार्य करते हैं तो यह जरुरी नहीं है कि मुख्य अर्थलाभ हो, वह हमारी उपलब्धि होगी, वही हमारी तरक्की का मापदंड होगा। यह उनकी सोच है। और ऐसी सोच मनुष्यों की मानसिक दरिद्रता को दर्शाता है। मुझे क्या उपलब्ध हुआ यह उस समय मालूम होता है जब प्रदेश और देश का मुखिया, जिला का मुखिया, बड़े-बड़े व्यावसायिक घरानों का मुखिया के सामने उसके लोग जब अख़बार का कतरन एक फाइल में पेश करते थे, उस कतरन में 200-शब्द की कहानी मेरी होती थी, पूरे देश में, पूरे प्रदेश में मंत्री से लेकर अधिकारी तक अपने-अपने व्यावसायिक अस्तित्व को, अपनी कुर्सियों को बचाने दंड पेलने लगते थे – तो लगता था आज की कहानी का कुछ असर हुआ। समाज में कुछ बदलाव जरूर आएगा। जिसके बारे में कहानी लिखा हूँ, उसके जीवन में आमूल परिवर्तन जरूर आएगा। और आता था, आया है।
क्या आज के पत्रकार ऐसी बात सोचते हैं। आज तो हिंदी लिखने वाले पांच शब्दों के बाद ‘अंग्रेजी’ शब्दों को ‘रोमन’ में लिखने लगते हैं। पूछने पर कहते हैं – बोलचाल की भाषा हो गयी है। अब उन्हें कौन बताये. ‘बोलचाल की भाषा नहीं हुई है, चुकी आधुनिक पत्रकारों के पास, चाहे किसी भी भाषा में लिखते हैं, शब्दों की किल्लत है। जब शब्द नहीं होगा, तो विन्यास क्या करेंगे ?
लव कुमार मिश्र कहते हैं: “हम गर्दनीबाग़ के सड़क संख्या 30 में रहते थे। एक दिन सुबह-सुबह लालू यादव का साला साधु यादव साईकिल से घर के दरवाज पर दस्तक दिया। पैडिल से पैर नीचे करते कहता हैं: “लव भैय्या….. दीदी जल्दी से बुलाई है …रो रही है।” मोहल्ले के नागरिक थे साधु यादव की बहन और उनका दूल्हा। मैं समय की गंभीरता को देखते, साधु यादव के चेहरे को पढ़ते, तुरंन्त निकल पड़ा । घर पहुँचने पर राबड़ी सामने बैठी थी। चेहरे में चमक तो था, परन्तु मन उदास था। आँखें लाल थी। सभी लक्षण दिख रहे थे कि वह काफी रोना-धोना हुआ है। मैं चारो तरफ देख रहा था। मामला कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तभी भोकार पारकर, फफककर राबड़ी रोने लगी और रोते-रोते बोलने लगी – ” ई त जेल में हथिन….. बचिया के छठ्ठी उनके बिना कैसे करबई ? पहिला बच्चा हैं। मिश्र जी कुछ मदद करिये न।”
यह सुनते ही मामला समझ में आ गया। लल्लू यादव (अब लालू यादव) उन दिनों जेल में थे। कारावास के दौरान राबड़ी देवी माँ बनी। लालू के घर में बेटी का जन्म हुआ था। साधु यादव वहीँ राबड़ी के बगल में खड़ा था। मैं आस्वासन देकर उठा। उसी शाम पांच बजे डॉ जगन्नाथ मिश्रा प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। वे नित्य शाम पांच बजे संवाददाताओं से मिलते थे। उस ज़माने में श्री धैर्या बाबू (डी. एन. झा) यूएनआई के वरिष्ठ संवाददाता थे। मैं डॉ मिश्रा से बताया। उन्होंने कहा की एक आवेदन पत्र दे दें। मैं चार आना में टाइप कराया।
उस आवेदन पत्र के कोने पर ‘कुछ अपठनीय’ लिखा गया और अगले दिन लल्लू यादव अपनी बेटी को देखने, छठ्ठी में उपस्थित होने 15 दिन के पे-रोल पर फ़्रेज़र रोड केंद्रीय कारा से घर वापस आये। एक निमंत्रण पत्र लिखा गया, छपाया गया बेटी होने की ख़ुशी में । छठ्ठी के अवसर पर सत्यनारायण भगवान का पूजा भी था। पटना विश्वविद्यालय के कुलपति देवेन्द्रनाथ शर्मा भी उपस्थित हुए। बेटी का नाम ‘मीसा’ रखा गया।” शेष तो मीसा के जीवन से, शिक्षा से, राजनीति से बिहार के लोग बाग परिचित ही हैं।
आज, मीसा भारती एक चिकित्सक और बिहार राज्य से एक सांसद और राज्यसभा सांसद हैं। मीसा भारती ने 10 दिसंबर, 1999 को कंप्यूटर इंजीनियर शैलेंद्र कुमार से शादी की और ने दंपति के तीन बच्चे हैं। 2014 में एक चिकित्सक से राजनीतिज्ञ बनी मीसा भारती ने पाटलिपुत्र की लोकसभा सीट के लिए असफल रूप से चुनाव लड़ा था और वे राजद के बागी राम कृपाल यादव से हार गई थीं, जो भाजपा में शामिल हो गए थे।
भारत ही नहीं, बिहार के भी बहुत काम लोग – आधुनिक लेखकों, पत्रकारों की बात नहीं करूँगा – जानते हैं कि जिस जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गाँधी को दिल्ली की सत्ता से, प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिए थे, कामयाब भी रहे, वे जयप्रकाश नारायण श्रीमती इंदिरागांधी को बेहद स्नेह करते थे। बेहद सम्मान देते थे।
लव कुमार मिश्र आगे कहते हैं: “ऐतिहासिक बेलछी नरसंहार के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी पटना आई थी। वे बेलछी में मारे गरे लोगों के घर पहुंची। पटना ही नहीं, देश विदेश के अख़बारों में, टीवी पर, रेडियो पर यह खबर दूर-दूर तक पहुंचा। लेकिन बेलछी से लौटने के बाद तत्कालीन राज्य सभा के सदस्य, जो बाद में संसद में कांग्रेस पार्टी का मुख्य सचेतक भी बने, श्री भीष्म नारायण सिंह के साथ, सीधा कदमकुआं जयप्रकाश नारायण के घर पहुंची। खुलेआम बातचीत की। आज जैसा नहीं – बंद कमरे में।
जयप्रकाश नारायण का श्रीमती गाँधी के साथ राजनीतिक मतभेद जो था उन दिनों, वे एक इंसान के रूप में श्रीमती गाँधी के सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिए – विजय हों आप। मतभेद अपनी जगह है, लेकिन आप एक योद्धा हैं।” इस घटना के बाद, खासकर आपातकाल के बाद, श्रीमती गाँधी फिर पटना आई। सरकार दिल्ली से प्रदेश तक बदल गई थी।
डॉ जगन्नाथ मिश्र के घर पर प्रेस सम्मेलन था। हम सभी उपस्थित थे। कोई तामझाम नहीं। देश में नई सरकार बनने के साथ ही राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ आर्थिक व्यवस्था भी चरमरा रही थी। पूरे देश में कानून-व्यवस्था गोता खा रही थी। तभी श्रीमती गांधी से एक सवाल पूछा कि “क्या वर्तमान परिस्थिति आपातकाल लागू करने लायक नहीं है? तक्षण श्रीमती गांधी मुस्कुराई और कहती है: “Do you think they will handle emergency?” और हंस दी।
इसी तरह सन 1974 में जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में ऐतिहासिक रेल हड़ताल हुआ था। हड़ताल के कारण सबसे बड़ा प्रभाव कोयला और बिजली उद्योग पर पद रहा था। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया की एक कॉपी कोई तीन पैराग्राफ की रिलीज हुई जिसमें प्रधान मंत्री तत्कालीन मुख्यमंत्री अद्बुल गफूर को एक पत्र के माध्यम से कहा था की हड़ताल से होने वाली कोयले की कठिनाइयों की निजात के लिए तत्काल प्रभावकारी कदम उठायें। ट्रक के माध्यम से कोयले की आपूर्ति किया जाए।
उस समय सर्चलाइट के मुख्य संवाददाता थे श्री मुक्ता किशोर जी। उन्होंने मुझसे कहा कि इस कहानी पर प्रदेश के मुख्यमंत्री की टिप्पणी लें और कहानी को लंबा करें सभी दृष्टिकोण से। मैं तत्काल ‘00079 नंबर’ पर टेलीफोन घुमा दिया और अपना परिचय देते उस छोड़ बैठे महानुभाव से उक्त विषय पर पूछा। दूसरे छोड़ पर अब्दुल गफूर खुद थे। मेरी आवाज सुनते ही वे कहते हैं: “प्रधानमंत्री ने लिखा है तो क्या मुख्यमंत्री चिठ्ठी लेकर घूमते रहे और ट्रक का बंदोबस्त करे। मुझे नहीं मालूम चिट्ठी के बारे में। अगर आयी भी होगी तो परिवहन आयुक्त के कार्यालय को प्रेषित कर दिया गया होगा। वहां से पूछें। वे झुंझला कर फोन पटक दिए।” मेरी कहानी 300 क्या 3000 शब्दों की हो गयी।
इसी तरह, उत्तर बिहार के कोशी नदी में एक रात भीषण घटना हुई एक नाव के पलटने से दर्जनों लोग मृत्यु को प्राप्त किये। एक छोटी से कहानी वहां के रिपोर्टर ने लिखाया। मुक्ता बाबू फिर मेरे हाथ में वह कहानी का टुकड़ा थमाते कहते थे: “देखो, इस कहानी को, विस्तार से बात करो, लिखो।” मैं नया नया पत्रकार था। तक्षण तत्कालीन मुख्य सचिव के घर फोन की घंटी टन टना दिया। उन दिनों मुख्यमंत्री या मुख्य सचिव किसी के घर, दफ्तर में एक छोटा सा रिपोर्टर काफी हैसियत और औकात रखता था।
इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री हो या मुख्य सचिव, जवाब भी देते थे। और वजह थी “दोनों की साख (गुडविल)”, लेकिन आज, भारतीय पत्रकारिता की, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की, भारत के मंत्रियों की, नेताओं की जो छवि है। वहज वैसी ही है है जैसी मत मांगने के लिए घर-घर जाने में, भीख मांगने में अपनी प्रतिष्ठा पर आंच नहीं देखते; लेकिन मंत्री-संत्री बनने के बाद देश के, प्रदेश के मतदाताओं की त्रदासी को हेलीकॉप्टर से, हवाई सर्वेक्षण से आंकते हैं। यह सम्पूर्ण मानसिकता का परिचायक है – समाज के पतन का।
समय बदल रहा था। आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, कृषि, विज्ञान आदि के क्षेत्रों में आधारभूत प्रतिवर्तन हो, प्रदेश के लोग बाग़, गरीब-गुरबा का जीवन भी हंसमुख हो, रिक्शावाले को, जूता सिलने वाले को, कपड़ा सिलने वाले को भी भर पेट भोजन मिले, उसके बच्चे भी विद्यालय जायँ; इसके बारे में पटना के लोग, बिहार के लोग, विद्वान-विदुषी, नेता भले नहीं सोचें; लेकिन सबों के मानस-पटल पर पटना के बेली रोड से दिल्ली के राजपथ तक यह अवश्य था की देश में राजनितिक सत्ता के गलियारे में जो बैठे हैं, उन्हें उठाकर बाहर फेक दिया जाय।
जो कल तक उस गलियारे का हिस्सा थे, उस दिन झंडा लेकर विरुद्ध में खड़े हो गए थे। स्वाभाविक है प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों की गद्दीदार कुर्सियां किसे नहीं अच्छी लगेगी। बिहार के तत्कालीन नेता अपने-अपने कपाल को तो साफ़ कर ही रहे थे, अपने-अपने पिछवाड़े के वस्त्र को भी उन कुर्सियों के उपयुक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। बिहार के लोगोखैर !!! इन सब बातों का, इन सब बातों से नीतीश कुमार पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। बहुत मोटे चमड़े के नेता हैं नितीश कुमार।
सम्मानित लव कुमार मिश्रा को समर्पित
