भागलपुर : आज की पीढ़ियां शायद नहीं जानती होगी कि भागलपुर का बांग्ला भाषी लोगों का इलाका आदमपुर और खंजरपुर, मुग़ल सल्तनत के समय दो भाइयों 'आदम' बेग और 'खंजर' बेग के नाम पर है। बादशाह अकबर ने आदम बेग के नाम पर 'आदमपुर' बनाया और खंजर बेग' के नाम पर 'खंजर पुर' बसाया। उसी तरह, अकबर के समय काल में ही 'माशक बेग' नामक एक संत अपने उत्कर्ष पर थे, उनके नाम से मशाकचक क्षेत्र बना। आज भी माशक बेग का मजाक इस क्षेत्र में अवस्थित है। इतना ही नहीं, अकबर के सल्तनत काल में भी शाह मंसूर की ऊँगली युद्ध के दौरान कटी थी।
शाह मंसूर के सम्मानार्थ "मंसूर गंज" इलाका बना, बसा। बादशाह अकबर के दरबार में एक मुलाजिम मोजाहिद थे। राजा अकबर के सम्मानार्थ सं 1576 में मोजाहिदपुर बसाये। अकबर के साम्राज्य काल में एक कर्मचारी तातार खान थे। जिनके नाम पर ततारपुर बसा। इसी तरह बंगाल के सुल्तान सिकंदर के नाम पर "सिकंदरपुर" इलाका है। अकबर के शासन काल मे ही फकीर शाह कबीर के नाम पर कबीरपुर बसा। आज भी उनका कब्र इस मोहल्ले में है। 'नरगा' का पुराना नाम नौगजा था यानी एक बड़ी कब्र ।कहते हैं कि खिलजी काल मे हुये युद्ध के शहीदो को एक ही बड़े कब्र मे दफ़्नाया गया था । कालांतर नौ गजा नरगा के नाम से पुकारा जाने लगा । मंदरोजा मुहल्ले का नाम शाह मदार का रोज़ा (मज़ार ) के कारण पड़ा।
काजवली चक मोहल्ला शाहजहाँ काल के मशहूर काजी काजी काजवली के नाम पर पड़ा । उनकी मजार भी इसी मोहल्ले मे है । इसी तरह, हुसेना बाद, हुसैनगंज और मुगलपुरा जहांगीर के समय बंगाल के गवर्नर इब्राहिम हुसैन के परिवार की जागीर के कारण बसा। यह भी कहा जाता है कि सुल्तानपुर के 12 परिवार एक साथ आकर एक स्थान पर बसे तो मोहल्ला बरहपुरा के नाम से जाने जाने लगा। सन 1576 ई मे शाहँशाह अकबर और दाऊद खान के बीच हुई लड़ाई में अकबर की सेना को फ़तह मिली थी, इसलिए यह स्थान 'फ़तेहपुर' हो गया। यह भी कहा जाता है कि जमाल उल्लाह एक विद्वान थे जो यहाँ रहते थे। उन्हे खलीफा कह कर संबोधित किया जाता था । परिणाम यह हुआ कि जहाँ वे रहते थे वह 'खलीफाबाग' बन गया। उनका मज़ार भी यहाँ है ।
शाह शुजा के काल मे सैयद मुर्तजा शाह आनंद वार्शा के नाम पर यह मुहल्ला असानंदपुर पड़ गया। अकबर काल के ख्वाजा सैयद मोईन उद्दीन बिलखी के नाम पर मोइनुद्दीन चक बसा था जो कालांतर मे मुंदीचक कहलाने लगा । हुसेनपुर मुहल्ले को दमडिया बाबा ने अपने महरूम पिता मखदूम सैयद हुसैन के नाम पर बसाया था । सूजा गंज औरंगजेब के भाई शाह सूजा के नाम पर है । यहाँ शाह सुजा की लड़की का मज़ार भी है। 'सराय' मोहल्ले में मुगल काल में सरकारी कर्मचारियों और आम रिआया के ठहरने का था, इसलिए यह 'सराय' हो गया।
लेकिन भागलपुर तो भागलपुर है - अशोक कुमार का जन्म स्थान। तभी तो बरबस दादा मुनि, किशोर कुमार, अनूप कुमार, उनकी मामी, गंगा किनारे का वह मकान, पीपल का वह वृक्ष याद आता है। और फिर गंगा की धाराएं तो मानस पटल को तरोताजा कर देती हैं। उस दिन भी वैसा ही हुआ था। उनका आदमपुर (भागलपुर) स्थित गंगा के किनारे वाला घर याद आ गया। गंगा तट पर हाव विशालकाय पीपल का वृक्ष याद आ गया जिसने दादामुनी, किशोर कुमार, अनूप कुमार, शरत चंद्र आदि महान विभूतियों को उनके बचपन में, जवानी में अपना छाँव दिया था। इस वृक्ष के नीचे कई इतिहास लिखे गए। गंगा का प्रवाह उन समस्त घटनाओं का चश्मदीद गवाह था। दादामुनी का जन्म यहीं हुआ था। भागलपुर की एक और पहचान है 'जर्दालु' आम। यह अलग बात है कि आज आम और दादा मुनि हैं, लेकिन दोनों की मिठास आज भी बरकरार है। विश्वास नहीं है तो भागलपुर का -सम्मेलन करके आजमा लें। खैर।
किशोर कुमार का चौथा वर्षी कुछ दिन पहले समाप्त हुआ था। मैं सन्डे पत्रिका में था। साल था सं 1991 - एक कहानी के क्रम में भागलपुर गया था। दो साल पहले यहाँ साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। सारा भागलपुर दंगे में नेस्तनाबूद हो गया था। भागलपुर का कोई भी ब्लॉक ऐसा नहीं था जो दंगों से अछूता रहा हो। लगभग 200 गाँव, बारह हज़ार के आस-पास घरें, हज़ारों पॉवर लूम्स, हैंडलूम्स जलकर राख हो गए थे। मस्जिदों और मज़ारों की तो बात ही छोड़ें । सैकड़ों अग्नि को सुपुर्द कर दिए गए थे। कारण तो मुझसे अधिक बिहार के लोग और दिल्ली के राजनेता जानते हैं आखिर दंगा क्यों हुआ । दंगे के दौरान भी दो दिन के लिए भागलपुर गया था। यहाँ मेरी बड़ी बहन रहती थी (पिछले वर्ष उसकी मृत्यु हो गयी और चार माह बाद उसके पति भी उसके पास पहुँच गए।) दोनों का मिलन हो गया होगा।
उस दिन जब भागलपुर पहुंचा तो साथ में कुछ भी नहीं था सिवाय पहने हुए वस्त्र के अलावे । कंधे पर एक बैग था और एक फुच्की (बहुत छोटा) सा कैमरा यासिका का और एक डायरी। बहन आश्चर्यचकित थी। पटना से ट्रेन छः घंटे होते-होते भागलपुर स्टेशन पहुंचा देती थी। बहन से मिलकर मैं छोटी खंजरपुर इलाके में अपने एक मित्र के पास पहुंचा जो गंगा किनारे स्थित सुन्दरवती महिला कॉलेज के पास रहता था। बहुत भाग्यशाली मानता था स्वयं को। सुवह आँख खोलते ही शहर की सुन्दर-सुन्दर बालाओं का दर्शन होता था। मुझे देखते ही भड़क गया - खलल होना था।
मैं अधिक समय नहीं लेकर उससे दादामुनि में मामा गाँव का पता-ठिकाना लिया और अपने गंतब्य की ओर निकल पड़ा। अगर आप भागलपुर के इस इलाके से वाकिफ़ हैं तो आप भी मेरे साथ भ्रमण कीजिये। आज इस क्षेत्र में जो भी देख रहे हैं, समझिये नहीं है। मैं छोटी खंजरपुर के चौराहे पर खड़ा हूँ और मेरा सुन्दर सा मुख गंगा की ओर है।खैर, जब कचहरी क्षेत्र से आप सैंडिस कम्पाऊण्ड की सीमा समाप्त कर दाहिने मेडिकल कालेज की ओर जाने वाली सड़क को छोड़कर सीधा रुख लेते हैं तो समझिये आप गंगा की ओर बढ़ रहे हैं।
कुछ दूर आगे बढ़ने पर अगर आपको हनुमानजी का दर्शन हो, दर्जनों नहीं, सैकड़ों में तो समझिये आप ठीक चल रहे हैं। एक बात और, यहाँ आपके दाहिने हाथ पर लोहे के एक गेट में लिखा मिलेगा: "कुत्तों से सावधान" - इस गेट के अंदर ऊपर जाने वाली सीढ़ियों से जब कोई घर के चौहद्दी में पहुँचता है तो यहाँ कुत्तों का दर्शन होता हैं, विदेशी नश्ल का। अगर आपको भी यह साईन बोर्ड दिख गया तो आप आस्वस्त हो जाएँ, आप ठीक चल रहे हैं। खंजरपुर चौराहे पर पहुँचने के बाद मैं बाएं हाथ जाने वाली सड़क पर लुढ़क गया। लुढ़कना स्वाभाविक था।
यहाँ की सड़कें समतल नहीं हैं, लोगबाग भी नहीं हैं, समतल - अब शायद हो गए हों। यहाँ तीन तरफ सड़कें जाती हैं - एक महिला कालेज होते गंगा की ओर और एक बाएं तथा दूसरा दाहिना ।पीछे से तो आ ही रहा था। बाएं हाथ कुछ दूर लुढ़कने के बाद मैं दाहिने तरफ एक खुले मैदान के अंतिम छोड़ से मुड़ गया। यह रास्ता भी गंगा किनारे तक ले जाती है। अंतर सिर्फ इतना था की इस सड़क के अंतिम छोड़ पर दो ऐसे विभूतियों का आवास था जो सरस्वती के वरदपुत्र थे - बाएं तरफ श्री शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, यानि शरत बाबू का घर और और दाहिने तरफ सुधींद्र बाबू (सुधींद्रनाथ जी) का घर। अशोक कुमार का जन्म इसी राजबारी में हुआ था। दिन था अक्टूबर 13 और साल 1911, यानि आज की तारीख से 114 वर्ष पहले।
मैं उन दोनों घरों के मुख्य द्वार के बीच कोई 10 -फीट का फालसा, कच्ची सड़क, धुप के कारण हवा के साथ मिटटी को फांकते खड़ा था। बीच-बीच में गंगा के तरफ से ठंढी हवा का झोंका मन को शांत कर देता था। दरवाजे पर खड़े एक बुजुर्ग को नमस्कार करते मैं निवेदन किया: "क्या मुझे शरत बाबू और दादामुनि का घर कौन है, बता सकते हैं? मैं आनन्द बाजार पत्रिका का साम्वादिक हूँ।" बुजुर्ग मेरी उम्र से तीन गुना था। "आपनि साम्वादिक !!! आसूंन।"इससे पहले की वे बांग्ला में कुछ और कहना प्रारम्भ करते, मैं बहुत विनम्रता से कहा: "बांग्ला मुझे आता नहीं......... "
इससे पहले की मैं कुछ और कहूं, वे बोले: "आत्मीयता की कोई भाषा नहीं होती। जो ह्रदय के तक्षण करीब आ जाते हैं वे होठों के स्पंदन से भी समझ जाते हैं की सामने वाला क्या बोल रहा है। आप आनन्द बाज़ार पत्रिका समूह के साम्वादिक हैं, इस धरती के लिए महान हैं, पूज्यनीय हैं। आपको पता है हम बंगालियों के घर में तीन चीजें मशहूर है - एक: माँ काली की तस्वीर, दो: स्वामी विवेकानंद की तस्वीर और तीन: आनन्द बाज़ार पत्रिका कागज़ (समाचार पत्र) ।
ह्रदय से उनकी बातों का अभिनन्दन करते उन्हें पैर छूकर प्रणाम किया और फिर शरत बाबू के घर के चौखट के अंदर प्रवेश लिया। एक बड़ा सा आँगन। आँगन से सीढ़ी से चढ़कर लाल सीमेंट वाला बरामदा जिसके खम्भे गोल-गोल थे। वे बता रहे थे यह दो भवन मात्र है, दो आँगन देखने को हैं - दोनों घरों के लोगों आत्मा एक ही है। मैं उनकी बातों की मार्मिकता को ह्रदय से समझ रहा था। कितना अटूट विस्वास। कितना अटूट प्रेम।इसी बरामदे पर घंटों बैठकर सभी नाटक का संवाद बोलते थे, लिखते थे। हंसी-मजाक चलता था। आँगन में तुलसी का पौधा लगा था। उस दिन भी वह हरा-भरा था। गोबर से तुलसी पौधा के जमीन को पोछा गया था ,पौधे की ऊंचाई कोई चार फीट की होगी। मैं दरवाजे के समीप खड़ा होकर दो-चार तस्वीर लिए। इस बीच एक युवक को संवाद देकर सामने भवन में भेजे। उस भवन में दादा मुनि की मामी रहती थी।
वे सज्जन मुझे सामने घर के दरवाजे तक ले गए और फिर दरवाजे की कुण्डी को पीटकर किसी के आने सूचना भी दिए। सामने कोई छः फीट ऊँची, दूध जैसा सफ़ेद जिसमें सूर्य की लालिमा दिख रही हो, वैसी त्वचा वाली एक पचास-पचपन साल की संभ्रांत महिला, साडी की पल्लू को गर्दन से घुमाकर कमर में दबायी, काले-सफ़ेद लम्बे बाल, लाल होठ - सुंदरता का पराकाष्ठा - सामने खड़ी थीं। मैं अपने अब तक उतनी सुन्दर, सौम्य महिला आज तक नहीं देखा।
बहुत ही मीठी आवाज में कहतीं हैं: "आसूंन" वे मुझे कमरे में ले गयीं। कोई 80-90 साल पुराना चमचमाता हुआ, बेहतरीन पलंग, जिसपर सफ़ेद और ब्लू रंग का चादर बिछा था, पलंग के चारो तरफ चौकोर आकार का लकड़ी का चमचमाता डंडा स्क्रू से कैसा था। यह मच्छरदानी लटकाने सहायक होता था। पलंग के नीचे फर्श पर मोटा कालीन बिछा था। महिला टेक लेते बैठीं। मैं सामने कुर्सी पर बैठा। सामने कमरे के एक कोने में विशाल यंत्र रखा था, संगीत सुनने के लिए। ग्रामोफोन का मुख दरवाजे के तरफ था। दीवारों पर ऐतिहासिक तस्वीरें टंगी थी। सामने आँगन में चतुर्दिक फूल लगे थे।
फिर मुस्कुराते कहतीं हैं: "आप बांग्ला नहीं समझते? मुझे बताया गया है। बहुत मधुर भाषा है एकदम "सन्देश" जैसा। इस बीच एक बेहतरीन तश्तरी में शोन्देश मिठाई और शीतल पानी बगल में रखे ,,मेज पर आ गया था। भागलपुर का सन्देश विख्यात था। फिर दादामुनि, किशोर कुमार, अनूप कुमार की बहुत सारी बातें बतायीं। उनके कमरे के बाएं तरफ जमीन से कोई पांच फीट नीचे एक विशाल कक्ष था जिसमें एक मंच बना था। सामने स्टेडियम जैसा अर्ध-चंद्राकार आकार में घुमावदार कुर्सियां थीं जो एक-दूसरे से जुडी थी। सभी लकड़ी के बने थे। स्टेज पर रौशनी लिए कमरे के विभिन्न क्षेत्रों से बड़े-बड़े लाइटों का बंदोबस्त था। वे बता रही थीं की कैसे सभी यहाँ नाटक का मंचन करते थे।
फिर मुझे पकड़कर गंगा की ओर निकलीं। उनके घर का पिछला हिस्सा। गंगा के तरफ आते ही दाहिने हाथ पर एक विशाल पीपल का बृक्ष था जिसके जड़ों को मिटत--पथ्थर-सीमेंट-बालू के मिश्रण अच्छा-खासा गोलाकार बैठकी बना दिया गया था जहाँ शरत बाबू बैठा करते थे। अनंत बातें हुईं। आज भी मानस-पटल पर छायीं हैं। ईश्वर आप सबों की आत्मा को शांति दें क्योंकि उस पीढ़ी बाद दूसरी-तीसरी पीढ़ी या फिर आने वाली पीढ़ियां न तो उस जमीन की सांस्कृतिक मूल्य को आंक सकती हैं, इसलिए भौगोलिक मूल्य के तहत आज सुनने की एक विशाल गगनचुम्बी अट्टालिका वहां कड़ी है - जहाँ न तो कोई वेदना समझने वाला है और न ही संवेदना ।
इस घटना के दसकों बाद एक बार फिर फोन के माध्यम से इस परिवार की तीसरी पीढ़ी के वंशज से संपर्क साधने का यत्न किया। अब तक इस भूभाग पर स्थानीय ताकतवर लोगों की निगाह पर चुकी थी। हो भी क्यों न। जब स्वामी कमजोर हो जाता है अथवा जब किसी को मुफ्त पैतृक संपत्ति प्राप्त होती है तब उस संपत्ति का "वास्तविक मोल" वह नहीं समझ पाता और तत्कालीन धाराओं में बाह जाता है इतिहास को मिटाते। यहाँ भी यही हुआ। बाद में सुनने को आया की भागलपुर के कुछ ताकतवर लोग, ठेकेदार इस भूमि पर अपना निशाना साध लिए थे। शायद आज वहां कोई गगनचुम्बी ईमारत बन गयी है ईंट-पथ्थर का।
19वीं शताब्दी से अब तक भागलपुर की मुख्यधारा में शामिल होकर यहां के सामाजिक व सांस्कृतिक उत्थान में गहरा योगदान देने वाले बंगाली समुदाय के लोग आज भी 'अपना भागलपुर' ढूंढते हैं जहाँ सामाजिक, शैक्षणिक व सांस्कृतिक विरासतों का संरक्षण व संवर्धन हुआ करता था। किसकी नजर लग गई भागलपुर पर। उन दिनों की बात याद कर आँखें अश्रुपूरित हो जाती है। अपने उस दर्द को, व्यथा को आज की पीढ़ियों को बता भी नहीं सकते - क्योंकि वह उसके सोच से परे है। भागलपुर अब 'स्मार्ट सिटीज' की गिनती में आ गया है।
लेकिन, बिहार बंगाली समिति की भागलपुर इकाई, भागलपुर दुर्गा बाड़ी तथा बंगीय साहित्य परिषद सहित कुछ अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधियों का कहना है कि जिले के बंगालियों को इस बात का गहरा मलाल है कि 19वीं शताब्दी में महान समाज सुधारक राजा राममोहन राय, कथा शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, महर्षि अरविंद घोष के बड़े भाई मनमोहन घोष, महिला कथाकार रोकैया बेगम, अमर कृति पथेर पांचाली उपन्यास के रचनाकार विभूति भूषण बंदोपाध्याय, बांग्ला के मशहूर कथाकार व उपन्यासकार बलाय चांद बनफूल, बांग्ला फिल्म जगत की मशहूर चरित्र अदाकारा छाया देवी, जाने-माने फिल्म निर्माता-निर्देशक तपन घोष, हिन्दी फिल्मों के अमर चितेरे दादा मुनि अशोक कुमार, पार्श्वगायक किशोर कुमार, गांधीजी को बांग्ला सिखाने वाली व 1955 में इंग्लैंड में टू-सीटर प्लेन चलाने वाली पहली भारतीय महिला तथा प्रख्यात समाज सुधारक केशवचंद्र सेन की बहू मृणालिनी सेन सरीखे अनेक बंगाली विभूतियों ने भागलपुर में बांग्ला साहित्य व संस्कृति की जो गगनचूंबी राजप्रासाद खड़ा किया था, वह उचित राजकीय संरक्षण व संवर्द्धन के अभाव में शनै-शनै विस्मृति के गर्भ में समाता जा रहा है।
कभी बहुसंख्यक नहीं तो बराबर के हिस्सेदार थे भागलपुर के समाज में बंगाली समुदाय। आज स्वयं को "अल्पसंख्यक" कहने को मजबूर हो गए हैं। इतना ही नहीं, कल तक जिनकी संस्कृति की तूती बोली जाती थी, आज उनकी सांस्कृतिक विरासत मृतप्राय हो गई है। बंगाली समुझाय के विद्वानों को, विदुषियों को, संभ्रांतों को स्थानीय नेताओं की ओर, चाहे पंचायत के नेताओं हों या विधान सभा-विधान परिषद् या लोक सभा के, बंगाली समुदाय के विद्वानों को, विदुषियों को, टकटकी निगाहों से देखना पड़ता है, यह शुभ सकते नहीं है समाज के लिए - चाहे आज का समाज हो या आने वाले कल का । बांग्ला भाषी समाज को अपने शहर चतुर्मुखी विकास, चाहे शैक्षिक हो, सांस्कृतिक हो, आध्यात्मिक हो, आर्थिक हो, सामाजिक हो, देखने के लिए मन ललक रहा है। वे अपनी सांस्कृतिक विरासतों को न केवल उन्नत देखना चाहते हैं, बल्कि बचाना भी चाहते हैं। लेकिन मन हताश है।
यह शहर जिन प्रसिद्ध बांगला साहित्यकारों की कर्मभूमि रही है आज की नई पीढ़ी से अनभिज्ञ है। किसे दोषी ठहराया जाए, किसे नहीं, यह कहना कठिन है। ऐसा माना जा रहा है कि विगत तीन-चार दशकों में भागलपुर से कोई पचास हज़ार से अधिक बंगाली परिवार पलायित हुए हैं। आज भागलपुर का माणिक सर्कार रोड, काली बाड़ी के क्षेत्र, आदमपुर, खंजर पुर, बंगाली टोला, मसूरगंज, खरमनचक जैसे बीरान को गया है।
जब रत्ना जी से पूछा आखिर शरत चंद्र जी की, किशोर कुमार की ननिहाल का राज बाड़ी का क्यों ऐसा हश्र हुआ? रत्न जी कहती है: "कुछ तो हम लोगों की गलती के कारण और कुछ समय का बदलता स्वरुप। इरा दीदी (बड़ी दीदी) अशोक कुमार-किशोर कुमार-अनूप कुमार की अपनी ममेरी बहन के पति की मृत्यु के बाद वह कलकत्ता जाने से इंकार कर दी। कलकत्ता में सारे परिवार थे। अपनी देखरेख के लिए एक सज्जन रखे थे। प्रारंभिक दिनों में उन्हें कहा भी था कि आने वाले समय में इन संपत्तियों पर कोई न कोई आधिपत्य कर लेगा। हम लोग भी उतना सचेत नहीं हुए। अशोक कुमार के पिता जबलपुर (मध्य प्रदेश) के थे और उनकी माँ का घर यह राज बाटी था। राज बाटी 19वीं और 20वीं शताब्दी में अपने उत्कर्ष पर था। यहीं स्टेज भी था जहाँ सभी नाटक भी करते थे।
