यह अखबार 29 नवम्बर, 1980 की है। आज 23 नवम्बर, 2024 है, यानी 44 वर्ष पहले। इस तारीख को पटना से प्रकाशित The Indian Nation अखबार में नौकरी किए पांच वर्ष हो गए थे। सन 1975 में मैट्रिक पास कर नौकरी की शुरुआत किया था। मन में एक अच्छा संवाददाता बनने की इक्षा लिए पटना विश्वविद्यालय से दिन में शिक्षा आगे बढ़ा रहा था और रात्रिकालीन सत्र में नौकरी कर पत्रकारिता का क ख ग सीख रहा था, आगे बढ़ रहा था। अस्सी आते-आते दिल्ली से प्रकशित The Indian Express की कीमत भी 50 पैसे हो गई थी। सन 1968 से 1975 तक, जब पटना की सड़कों पर अखबार बेचते थे, यह अख़बार 36 नए पैसे में मिलते थे हॉकरों को। प्रति अखबार 14 नए पैसे का मुनाफा होता था। रविवासरीय अंक में 20 पैसे का बचत होता था। खैर।
अस्सी के दशक में जिस दिन अपरान्ह काल दफ्तर में यह अखबार आया था, हम The Indian Nation के सम्पादकीय विभाग में स्नातक कर उप-संपादक का कार्य सीख रहा था। मसलन प्रांतीय समाचारों को पुनः लिखना, हेडलाइन बनाने में 14 पॉइंट / कॉलम से 36 पॉइंट x तीन / चार कॉलम में कितने अक्षर आएंगे यह कंठस्त कर रहा था, ताकि फटाफट हेडलाइन दिया जा सके। उस दिन दोपहर में ही एजेंसी इस खबर को चला दी थी। स्वाभाविक है बिहार का सबसे अधिक बिकने वाला अखबार होने के कारण तत्कालीन संपादक श्री दीनानाथ झा, सहायक संपादक श्री गजेंद्र नारायण चौधरी, श्री ज्वाला नंदन सिंह, श्री सीताशरण झा, श्री सिद्ध विनायक झा कभी अपने कक्ष में तो कभी सम्पादकीय विभाग में भाग दौड़ कर रहे थे। कई दर्जन कहानियां, सम्पदकीय लिखा गया पटना से दिल्ली तक। मुझे नहीं मालूम था कि इस अखबार में प्रकाशित इस खबर के कुछ साल बाद मैं भी इस अखबार का हिस्सा बनूँगा और मेरी लिखी कहानियां भी इसी स्थान पर प्रकाशित होगी। दिल्ली सल्तनत में यह अख़बार मुझे बेहतरीन पहचान दिया।
बहरहाल, आइये चलते हैं भागलपुर। भागलपुर की अमानवीय घटना जब उत्कर्ष पर थी, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पटना आई थी। इंदिरा गांधी भागलपुर की घटना के कारण बहुत दुखी थी। उनके देश का नाम विश्व के पटल पर कलंकित हो रहा था। विश्व के शीर्षस्थ नेता उनसे पूछ रहे थे। इंदिरा गांधी भागलपुर की घटना को देश के साथ जोड़ रही थी। उनके लिए यह घटना देश की प्रतिष्ठा को दाव पर लगा दिया था, कलंकित कर दिया था। भारत का नाम बदनाम हो गया था। पटना एरोड्रोम पर डॉ मिश्र को बहुत फटकार लगा। वे उन्हें अपने साथ बैठने तक नहीं दीं। हवाई जहाज में चढ़ने तक नहीं दीं। एरोड्रोम पर पत्रकारों की संख्या भी बहुत कम थी।
जैसे ही डॉ मिश्र श्री अरुण सिन्हा (इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संवाददाता) देखे जोर से कहने लगे… …बाप रे बाप ….क्या कर दिया आपने ? जगन्नाथ मिश्र की सोच अपने प्रदेश तक सीमित थी। उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता थी। उधर भागलपुर की पुलिस की सोच प्रदेश के राजनीतिक और भौगोलिक सीमा तक सीमित था और न्यायालय तो चेरिटेबल एंगल से सम्पूर्ण घटना को देख ही रहा था। कुल मिलाकर सभी अपने-अपने दृष्टि से घटना को देख रहे थे। कोई बदनामी की नजर से तो कोई राजनीती की नजर से। लेकिन “कानून” में उद्धृत नियमों के तहत दोषियों को कड़ी-से-कड़ी सजा हो, कोई नहीं सोचा रहा था, कोई नहीं देख रहा था
उन दिनों ही नहीं, मुद्दत तक भागलपुर कारावास के मुख्य द्वार पर लिखा था "भटकाव कोई अपराध नहीं है और सुधार हमारा प्रयास है। घृणा अपराध से करो, अपराधी से नहीं।" भागलपुर के आपराधिक इतिहास के मद्दे नजर कोई भी व्यक्ति इसे दो दृष्टि से देखेगा । एक: तैंतालीस वर्ष पूर्व भागलपुर की पुलिस जिस तरह अपने जिले का 33 लोगों की आखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डालकर, उनके अपराधों की सजा (सभी अपराधी नहीं थे और न्यायालय द्वारा अपराध सिद्ध भी नहीं हुआ था) दी थी - उसका एक पश्चाताप है। यह 17-शब्द इस बात का प्रमाण भी है कि भागलपुर पुलिस के कप्तान साहेब मनोविज्ञान के मर्मज्ञ हैं जो 'अपराध', 'अपराधी' में 'शाब्दिक' और 'मौलिक' भेद को समझते हैं और प्रत्येक अपराधी को, चाहे उन्हें भारत का न्यायालय 'अपराधी' घोषित किया हो अथवा नहीं, उन्हें दुस्तस्त कर उनके परिवार की, समाज की विकास की मुख्यधारा में जोड़ने का अथक प्रयास कर रहे हैं। जो एक बेहतरीन प्रयास है।
दो: इन 17 -शब्दों को केंद्रीय कारा के प्रवेश द्वार पर उद्धृत देखकर यह भी सोच सकता है कि यह महज एक दिखावा है और चारदीवारी के अंदर सन 1861 में बने पुलिस एक्ट और 1862 में लार्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले की अध्यक्षता में लॉ कमीशन ऑफ़ इण्डिया की अनुशंसा पर बने भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तहत, साथ ही, सन 1974 से लागू दंड प्रक्रिया संहिता ( Code of Criminal Procedure) में जितने प्रकार के "दंड" संभव हो सकते हैं, उसे प्रयोग में लाकर चारदीवारी के अंदर बंद भारत के नागरिक को दण्डित करना है - न्यायालय चाहे वैसी दण्डित किया हो अथवा नहीं ।
दंड देने से सम्बंधित जो भी प्रावधान हैं वे सभी सन 1947 के पूर्व के बने हैं, सिर्फ दंड प्रक्रिया को छोड़कर । हाँ, सन 1947 के बाद स्वतंत्र भारत की सरकार अपनी सुविधा अनुसार और 'मतदाताओं के रक्षार्थ' समय-समय पर जितना भी परिवर्तन संभव हो पाया, करती आयी है। जिस तरह सन 1947 में अंग्रेजी हुकूमत वाली सत्ता का हस्तानांतरण तत्कालीन वाइसरॉय लार्ड लोईस माउण्टबेटन भारत के तत्कालीन नेताओं को किये, स्वाभाविक है, सत्ता के साथ भारतीय दंड संहिता, पुलिस एक्ट इत्यादि नियमों का भी हस्तान्तरण किये होंगे।
अब अगर परतंत्र भारत में उन नियमों, कानूनों का प्रयोग तत्कालीन भारतीयों ने अपने ही देश के नागरिकों को जमीन के अंदर गाड़ने के लिए किया था, ताकि अंग्रेजों की हुकूमत भारतीय महाद्वीप पर जारी रहे; वैसी स्थिति में आज़ादी के महज 30-32 साल बाद ही, भारत के आम लोगों को संविधान और कानून की नजर में 'समानता का अधिकार' कैसे प्राप्त हो जाता। आजादी के 75-साल बाद आज भी सभी कानून गरीबों को गरीबों की नजर से, अमीरों को अमीरों की नजर से, पैसे वालों को धनाढ्यों की नजर से, गरीबों को दरिद्रों की नजर से देखती आयी है, देख रही है।
स्वतंत्र भारत में दंड प्रक्रिया संहिता, यानी Code of Criminal Procedure, 1973 को लागू हुए महज पांच साल ही तो हुए थे । यह दंड प्रक्रिया भारत में आपराधिक कानून के क्रियान्यवन के लिये निर्मित क़ानूनी प्रक्रिया है। यह सन् 1973 में पारित हुआ तथा 1 अप्रैल 1974 से लागू हुआ। इस में 37 अध्याय और कुल 484 धाराएं हैं। जबकि, भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन 1860 में लागू हुई। इसके बाद इसमें समय-समय पर संशोधन होते रहे।
यह भारत के अन्दर भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा व दण्ड का प्रावधान करती है। इस संहिता में कुल 23 अध्याय हैं और इसमें 511 धाराएं हैं। लेकिन न तो 'भारतीय दंड संहिता' और ना ही 'भारत में दंड प्रक्रिया' किसी भी खाकीधारी को यह अधिकार दिया है कि वह न्यायालय में साबित हुए बिना भी किसी व्यक्ति को अपराधी कह दे, उसकी आखें फोड़ दे, उसमें तेज़ाब डाल दे और मरने के लिए सड़क पर छोड़ दे।
विगत दिनों भागलपुर गया था। भागलपुर में मेरी अपनी सबसे बड़ी बहन रहती थी। उसका ससुराल था वहां। उसका घर भागलपुर के ह्रदय में था। मेडिकल कॉलेज की दीवार और उनके ससुराल वालों के घरों का दीवार एक ही था। आज न बहन है, न उसका पति और ना ही ससुराल। सब समाप्त हो गया। मुद्दत से भागलपुर रेलवे स्टेशन से आते समय जैसे ही कचहरी रोड से पीरबाबा के पास पहुँचता था, उन्हें प्रणाम कर दाहिने हाथ को मुड़ता था और फिर शशीबाबू के सफ़ेद घर से नीचे लुढ़क जाता था। बाएं हाथ कोना वाला मकान दीदी के ससुराल वालों का ही था।
देश आज़ाद नहीं हुआ था जब दरभंगा के एक गाँव से वह अपने मांग में सिंन्दुर भरकर अपने पति के साथ ससुराल पहुंची थी। अपना सम्पूर्ण जीवन इसी भूमि पर बिताई थी वह । उसके साथ मोहल्ले में जो भी बहुएं आयी थी, सभी के बच्चे, उसकी बच्चों के साथ बड़ी हुई, सैंडिस कम्पाऊण्ड के टीले पर चढ़ी, नीचे लुढ़की, खेलते-कूदते पढ़ी-लिखी और फिर अपने जीवन पथ पर निकलती गयी। सबौर-रोड और पीरबाबा के सामने से नीचे गंगा छोड़ की ओर जाने वाली सड़क को मिलाने वाला रास्ता डॉ बिटसन रोड मुद्दत तक नहीं बन पाया था। यहाँ तक की जब उसकी तीनों बेटियों की शादी हुई डॉ बिटसन रोड को पत्थर, अलकतरा का दर्शन तक नहीं हुआ था।
आज़ाद भारत में प्रथम, द्वितीय, तृतीय और न जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं बन गई थी। उन योजनाओं में विकास के नाम पर आवंटित लाखों-करोड़ों रूपये पटना के रास्ते भागलपुर के ट्रेजरी तक पहुँचता तो था, लेकिन बीच में ही दम तोड़ देता था। वजह भी था - तत्कालीन राजनेता लोग विधान सभा, विधान परिषद् में अपने लोगों की संख्या कम नहीं होने देना चाहते थे। कम होने से विधानसभा में मुख्यमंत्री का पदच्युत होना स्वाभाविक था। जैसे ही मुख्यमंत्री बदले, वैसे ही बिहार के जिलों में जिलाधिकारी, जिला विकास पदाधिकारी, पुलिस अधीक्षक सभी अपना-अपना बोरिया-बिस्तर बांधने को मजबूर हो जाते थे। यही नियम था, आज भी है ।
इसलिए कोई भी, चाहे 'खादीधारी' हों या 'खाकीधारी' हों - सभी आपसी तालमेल बनाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे, छोड़ते हैं। अधिकारियों के माता-पिता, सास-ससुर, टोला-मोहल्ला के लोग, साला-साली भले 'गाल फुला' लें, उन्हें मान्य था, मान्य है और रहेगा भी; लेकिन भागलपुर सहित, प्रदेश के अन्य संसदीय और विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों से विजय होकर दिल्ली के लोकसभा और पटना के विधानसभा में बैठे नेताजी गाल नहीं फुलाएं, किसी भी कीमत पर नहीं - अधिकारियों के आधिकारिक जीवन का मुख्य उद्देश्य होता था। आज भी परिस्थितियां लगभग वही है।
साठ के दशक के मध्य में जब पटना आया था, उस समय दीदी का ससुराल आने में कोई तकलीफ नहीं होता था। कोई भय भी नहीं होता था। बस पटना में किसी भी ट्रेन पर बैठ जाते थे, जो भागलपुर होकर आगे निकलती थी और वहां उतरकर हँसते-मुस्कुराते घर पहुँच जाते थे। लेकिन अस्सी के दशक के प्रारंभिक वर्षों में भागलपुर अकेले जाने में डर लगता था। यह अलग बात थी कि उन दिनों पटना से प्रकाशित आर्यावर्त-इण्डियन नेशन समाचार पत्र समूह में नौकरी करता था और पत्रकारिता की प्रथम सीढ़ी पर पैर भी रख दिया था। दीदी कहती भी थी कि "डरने की कोई बात नहीं है", लेकिन पटना से प्रकाशित अख़बारों में ख़बरों को पढ़कर अच्छे-अच्छे पहलवानों को डर से पेशाब हो जाता था उन दिनों। हमारे शरीर में कुल 206 हड्डियों और मांसों का सम्पूर्ण वजन (आधा किलो कपड़ा सहित) 45-50 किलोग्राम से अधिक नहीं था, डरना लाज़िमी था।
उन्हीं दिनों भागलपुर पुलिस यहाँ की सड़कों पर लोगों को पकड़कर उनकी आखों को फोड़ देती थी । आखों में तेज़ाब डाल देती थी । पुलिस कहती थी जिला में अपराधों और अपराधियों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अपराध अपने उत्कर्ष पर था। अपराधियों को अलग-अलग राज नेताओं का राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त था। पुलिस नेताओं के आगे, दबंगों के आगे सम्पूर्णता के साथ 'समर्पण' भले नहीं स्वीकार रहे थे, लेकिन उनके हाव-भाव-भंगिमा इस बात का गवाह था कि वे उन अपराधियों के मदद से ही नेतागिरी कर पाने में सामर्थ्यवान हैं।
इधर नेताजी आगे बढ़ रहे थे, उधर दबंग-अपराधी भी बिहार विधान सभा और लोक सभा में अपनी-अपनी कुर्सियां सुरक्षित कर रहे थे। प्रदेश में 'राजनीती का अपराधीकरण' और 'अपराधी का राजनीतिकरण' दोनों में दांत-काटी-रोटी जैसा सम्बन्ध स्थापित हो रहा था, दोनों फल-फुल रहे थे, बढ़ रहे थे, सामर्थवान हो रहे थे। जनता का कमजोर, निरीह, असहाय होना स्वाभाविक था।
भागलपुर के कई घरों के दरवाजों पर, प्रवेश द्वारों पर जहाँ उन दिनों "स्वागतम" लिखा देखा था; आज "कुत्तों से सावधान" लिखा दिखा। खंजरपुर इलाके में बंदरों की संख्या में इजाफ़ा ही दिखा। सड़कें आज भी समतल नहीं दिखीं। लोग बाग का व्यवहार 'समतल' महसूस कर रहे थे। पीर बाबा के पास चार रास्ते "प्रेम" से एक साथ उन दिनों भी मिलते थे, आज भी दिखा । एक स्टेशन की ओर से आती है। एक महिला कालेज होते गंगा की ओर जाती है। बाएं तिलकामांझी और दाहिना मेडिकल कॉलेज होते सबौर की ओर। इसी रास्ते में जेल भी है। गंगा छोड़ की ओर जाने वाली सड़क को आज की पीढ़ियां भले 'सुन्दरवती महिला कालेज' के कारण जानती हो; लेकिन गंगा छोड़ के बाएं हाथ भारत के दो ऐसे विभूतियों का आवास था उन दिनों, जो सरस्वती के वरदपुत्र थे - श्री शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, यानि शरत बाबू का घर और और सुधींद्र बाबू (सुधींद्रनाथ जी) का घर। दादामुनी यानी मुंबई फिल्म जगत के शहंशाह अशोक कुमार का जन्म इसी राजबारी में हुआ था अक्टूबर 13 सं 1911 को। खैर।
भागलपुर में जो खादी में थे, वे अलग "गैस" में थे। जो खाकी में थे, उनका "गैस" में रहना स्वाभाविक ही था। सन 1979-1980 के दौरान भागलपुर शहर और जिले की गलियों में, सड़कों पर, खेतों में लोगों की आखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डालकर 'विश्व का जघन्य अमानवीय घटना' को अंजाम नहीं दिया गया था । कहते हैं उस समय लड़कियों को उठाना, व्यापारियों का अपहरण, हत्या, लूट, बलात्कार जैसी घटनाएं रोजमर्रे की बात हो गई थी । पुलिस अपराधी को पकड़ भी लेती कभी तो बिना किसी गवाह अथवा सबूत के उन्हें उनको छोड़ना पड़ता था । किसी की हिम्मत नहीं थी बाहुबलियों के खिलाफ खड़े होने की। फिर पुलिस एक रास्ता अख्तियार की - पहले अपराधियों को पकड़ना, उसका आँख फोड़ना और फिर उसमें तेजाब डाल देना ।
यह परंपरा लगभग 2 साल चली और कोई 33 अपराधियों को इस तरह से सजा दी गई । सन 1979 से 1980 के बीच हुए अंखफोड़वा कांड का तब लोगों में ऐसा भय समाया हुआ था कि लोग विचलित हो गए थे। यह अलग बात थी की भागलपुर के लोग पुलिस के समर्थन में सड़क पर उतर गयी थी। लेकिन लाल टोपी वालों को देख मोहल्ले के लोग भयभीत हो जाते थे, क्या पता पुलिस किसे उठा कर ले जाए और आंखें फोड़ दे। अपराधियों को ऐसी सजा - विश्व के इतिहास में पहला था।

इस घटना के कोई दस साल बाद भागलपुर एक बार फिर विश्व की नजर में आया।यहाँ साम्प्रदायिक दंगे हुए थे। सारा भागलपुर दंगे में नेस्तनाबूद हो गया था। भागलपुर का कोई भी ब्लॉक ऐसा नहीं था जो दंगों से अछूता रहा हो। लगभग 200 गाँव, बारह हज़ार के आस-पास घरें, हज़ारों पॉवर लूम्स, हैंडलूम्स, मस्जिदों और मज़ारों को अग्नि को सुपुर्द कर दिया गया। अंखफोड़बा काण्ड क्यों हुआ? इस कांड के बारे में किसे पता था? दस साल बाद दंगा क्यों हुआ? कौन थे इसके पीछे - यह सभी बातें तो स्थानीय पुलिस और प्रदेश और दिल्ली के राजनेता अधिक जानते हैं। न्यायालय चाहे भागलपुर का हो या पटना का या फिर दिल्ली का - उतना ही जान पाई या जान पाती है, जितना उसे बताया जाता है । लेकिन जो भी हो - पीड़ित/पीड़िता चाहे अंखफोड़बा काण्ड के हों या दंगा के - न्याय के लिए जीवन पर्यन्त गुहार लगाते रहे। आज भी लगा रहे हैं। वे रोते रहे, बिलखते रहे 'न्याय' के लिए; और "उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगा " - इस दौरान सत्ता के गलियारे में "खादी धारियों" के चेहरे भी बदलते गए। कुछ नेता महादेव के शरण में अपनी उपस्थिति दर्ज किये, तो कुछ का स्थान युवकों ने छीन लिया। जो "खाकीधारी" थे, वे प्रदेश के अन्य जिलों के रास्ते कुछ अवकाश प्राप्त कर लिए, कुछ ईश्वर के दरबार में उपस्थित हो गए।
कहानी जारी रहेगी ..... ✍
