बहरहाल, भागलपुर अंखफोड़बा काण्ड से सम्बंधित पहला रिपार्ट दिल्ली से प्रकाशित दी इण्डियन एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ था। उस कहानी को लिखा था श्री अरुण सिन्हा जी। सिन्हा साहेब बेहतरीन लेखक और पत्रकार ज़माने में तो थे ही, आज तो उत्कर्ष पर हैं । वैसे देश में “सोच बदलो-देश बदलेगा” वाली बात सन 2014 के बाद आया, सरकारी दस्तावेजों पर ‘तस्वीर’ के साथ प्रकाशित होना प्रारम्भ हुआ और करोड़ों लोग इस ‘स्लोगन’ के ‘फॉलोवर्स’ बन गए। लेकिन ‘सोच’ में कोई ‘परिवर्तन’ नहीं दिखा, उसी तरह, जिस तरह सं 1861 में बने पुलिस ऐक्ट से आज भी भारत के 15,579 पुलिस स्टेशनों का सञ्चालन होता है। खाकी वर्दीधारी चलते हैं। यही कारण है कि इस 15, 579 पुलिस स्टेशनों में मात्र 79 स्टेशन ही ‘बेहतरीन’ पुलिस स्टेशनों की श्रेणी में दर्ज हो सका । चयन का कार्य सरकारी स्तर पर ही हुआ है। यह एक दृष्टान्त है।
अरुण सिन्हा कहते हैं: “यह (भागलपुर अंखफोड़बा काण्ड) सूचना सर्वप्रथम एसएनएम आबदी साहेब को मिला था। भागलपुर में रहने वाले उनके कोई एक महत्वपूर्ण परिचित एक पत्र के माध्यम से उन्हें सूचित किये थे। उस ज़माने में संवाद भेजने का दो ही रास्ता था – अगर फोन उपलब्ध है तो ट्रंक कॉल या फिर पत्र। आबदी साहब सूचना पाते ही भागलपुर के लिए निकल गए थे। सम्भवतः उस ज़माने के एक मात्र फोटोग्राफर कृष्ण मुरारी किशन भी उनके साथ गए थे। कलकत्ता के आनंद बाजार पत्रिका समूह के ‘संडे’ पत्रिका के लिए आबदी साहेब कहानी लिखते थे ।
‘संडे’ पत्रिका में उन दिनों कहानियों की लम्बी कतार होती थी। आबदी साहेब भागलपुर पहुंचकर पीड़ितों से मिलकर, पुलिस से मिलकर, यानी प्रशासन के सभी अंगों से मिलकर विशालकाय कहानी अपने पत्रिका के लिए लिखे, प्रेषित किये। उन दिनों संडे पत्रिका में कहानियां बहुत पहले ली जाती थी ‘अग्रिम’ और कॉपी भी वर्तमान संस्करण के लिए शीघ्र बंद हो जाती थी। जब तक आबदी साहेब अपनी कहानी प्रस्तुत करते, तब तक वह संस्करण बंद हो गया था और प्रकाशन के स्तर पर थी पत्रिका । लाख चाहकर भी कुछ नहीं हो सका।
अरुण सिन्हा कहते हैं: “परिणाम यह हुआ कि उनकी कहानी उस संस्करण में नहीं आ पाई। यही अंतर होता है पत्रिका और दैनिक समाचार पत्रों में। यह बात पटना में एक बैठक के दौरान मुझे मालूम हो गया। किसी के मुख से यह बात ‘लिक’ कर गया । एक दैनिक समाचार पत्र के रिपोर्टर होने के नाते मैं उसे नजरअंदाज नहीं किया और मैं तत्काल दिल्ली को सूचित कर भागलपुर निकल गया। फिर वहां पहुँचने पर पीड़ितों से, अधिकारियों से, स्थानीय लोगों से, नेताओं से, समाज के सभी तबकों के लोगों से मिला।
अगले दिन इण्डियन एक्सप्रेस में यह कहानी बहुत ही प्रमुखता के साथ प्रकाशित हुई। उन दिनों ही नहीं, आज भी ऐसी ‘अमानुषिक’ घटनाओं को कोई भी दैनिक अखबार, पत्रिका बहुत प्राथमिकता से प्रकाशित करता है। लेकिन दैनिक अख़बारों और साप्ताहिक या पाक्षिक पत्रिकाओं में समय का अंतर होता है। उनके पास अफरात समय होता है, मेरे पास नहीं। लेकिन यह कहानी आबदी साहेब की ही थी, यह मैं आज भी अन्तःमन से मानता हूँ। उन्हें ‘समय मात’ दे दिया, अन्यथा ‘संडे’ पत्रिका में जरूर प्रकाशित हुआ होता। मैं ‘समय को मात’ दे दिया और उनकी कहानी को ही आगे बढ़ाया। इसे हम “फॉलो-अप” कहेंगे। उसके बाद तो अगले तीन-चार महीनों तक यह सिलसिला जारी रहा।”
सिन्हा साहब कहते हैं: “स्वतंत्र भारत में शायद भागलपुर का वह कांड पहला कांड रहा होगा, आज भी, जहाँ पुलिस के साथ वहां की जनता सड़क पर आ गयी। वहां के लोग पुलिस के उस क्रिया-कलापों को सराही थी । उस घटना के बाद आज तक कभी न तो ऐसी घटना हुई और ना ही, लोग पुलिस के पीछे खड़े हुए। उन दिनों भागलपुर के लोग अपराधियों से त्रस्त थे । अपराध के आंकड़े और ग्राफ लगातार ऊपर चढ़ रहा था। पुलिस की संख्या भी कम थी। दूसरे तरफ, अपराधी भी एक खास जाति और विचारधारा के थे। यह भी नहीं झुठलाया जा सकता है कि अपराधियों को, चाहे छोटे हों अथवा बड़े, संरक्षण प्राप्त ‘नहीं’ था। यह संरक्षण ‘छोटे नेताओं’ का भी हो सकता था, ‘बड़े नेताओं’ का भी हो सकता था।
उस समय पुलिस के पास भी कोई विकल्प नहीं दिख रहा था। अगर अपराधियों को पकड़कर बंद भी करती थी तो क़ानूनी प्रक्रिया में अनेकानेक बाधाएं आती थी। परिणामस्वरुप अपराधी बाहर हो जाते थे। उस समय भागलपुर जैसे शहर में पुलिस द्वारा ऐसे निष्ठुर, क्रूर कदम उठाना शायद त्रादसी का पराकाष्ठा रहा होगा। पुलिस लोगों को, जिनकी थोड़ी भी आपराधिक गति-विधि थी, पकड़कर थाने में, राते के अँधेरे में, शांत गली में, स्थिर मोहल्ले में, बस्ती में आखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डाल रही थी । खाकी बर्दी में लोग अमानुषिक, जघन्य अपराध कर रहे हैं। यह घटना शायद 1979 के पहले से चल रही थी। सन 1979 तक दर्जनों ऐसे हादसे हो गए थे। विभिन्न प्रकारों के अपराध खुलेआम हो रहे थे। अचानक हादसों की गति बढ़ गयी।”

सिन्हा साहब कहते हैं कि “यह बात सही है कि जब पुलिस ऐसे निष्ठुर और क्रूर तरीकों का अख्तियार करने लगी, भागलपुर ही नहीं, आस-पास के इलाकों में, जिलों में अपराध और अपराधियों की संख्या स्वतः कम हो गई। बहुत सारे अपराधी शहर छोड़कर भी भाग गए। भागलपुर के लोग पहली बार पुलिस के इस रबैये का समर्थन किये। सड़क पर उतड़े। लेकिन सबसे बड़ी बात यह थी कि जिनके साथ स्थानीय पुलिस ऐसी क्रूर हरकत की, वे एक साधारण आदमी थे, अगर अपराधी भी थे (थोड़ी देर के लिए मान भी लें) तो उनका अपराध का स्तर उतना ऊँचा नहीं था की उन्हें आँख फोड़कर उसमें तेज़ाब डाल दे। इतना ही नहीं, जो लोग पुलिस के इस घृणित कार्य के समर्थन में सड़क पर उतरे, उसका पीठ थपथपाये, वे कौन थे ? कहाँ से आये थे ? किस जाति या संप्रदाय के थे ? कौन उन्हें संरक्षण दे रहा था ? किसके कहने पर वे पुलिस का साथ दे रहे थे ? इस बात से सभी अनभिज्ञ रहे। न तो स्थानीय पुलिस, न प्रदेश की सरकार, न जांच एजेंसियां – किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में स्थानीय पुलिस का सम्पूर्णता के साथ भागीदारी तो था ही, उनके ऊपर के स्तर के लोगों का, समुदाय का, नेताओं की भागीदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था। जो जांच – दोष और सजा से अछूता रह गया।”
ब्रितानिया सरकार के ज़माने में, खासकर भारत की आज़ादी की लड़ाई को दमित करने के लिए ब्रिटिश सरकार सन 1861 में (अपने हित के लिए) जो पुलिस एक्ट बनायीं थी, उसका कोई 120 वर्ष होने वाला था । वैसे 22 मार्च, 1861 के पुलिस एक्ट के प्रस्तावना में लिखा था: “WHEREAS it is expedient to re-organise the police and to make it a more efficient instrument for the prevention and detection of crime”, लेकिन भागलपुर में “कुछ और हो रहा था”, जो पुलिस एक्ट के इस प्रस्तावना से भिन्न था और कहा जाता है कि इसकी जानकारी तत्कालीन राजनेतओं को, राजनीतिक गलियारों में सफ़ेद वस्त्र धारियों को पता भी था ।
अरुण सिन्हा कहते हैं: “जितने भी नियम हैं, जिसके आधार पर पुलिस अपना कार्य करती है अथवा करनी चाहिए, वह ‘प्रिवेंशन’ और ‘कर्व’ पर आधारित होना चाहिए। अपराध को उक्त नियमों के तहत रोकें, अपराध की दुनिया में कोई आदमी प्रवेश नहीं करे, समाज में ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, समाज में अपराध नहीं बढे, इसलिए उन सभी कारणों पर ध्यान देना चाहिए, अपराधों की रोक-थाम के लिए जो भी तरीके हों, उसका अनुपालन करना चाहिए – न की अपराध ख़त्म करना है तो अपराधी को ही ख़त्म कर दो।
भागलपुर में भी कुछ वैसा ही हुआ था जो एक व्यवस्थित तरीके से, सोची-समझी साजिश के तहत संपन्न हो रहा था। जिला के शीर्षस्थ पुलिस अधिकारी, जिनके जिम्मे पूरे जिला का शासन-व्यवस्था हो और वह यह कहे कि हमको मालूम नहीं था की पुलिस आँख फोड़ रही है, उसमें तेज़ाब दाल रही है … फिर तो पुलिस का होना, नहीं होना कोई अर्थ नहीं रखता…बेकार है। पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक, पुलिस उप-महानिरीक्षक स्तर के सभी अधिकारियों को इसकी जानकारी थी लेकिन रोकना कौन चाहते हैं, कौन नहीं यह करोड़ों का प्रश्न था। अगर रोकना चाहते तो ऐसी कुकृति होती ही नहीं। सभी इस कार्य में शामिल थे। सभी पेट्रोनॉइज़ कर रहे थे।”
अरुण सिन्हा आगे कहते हैं: “भागलपुर की पुलिस जिस तरह 33 लोगों की आँखों को फोड़कर, उसमें तेज़ाब डालकर, उनके जीवन को अन्धकार बना दिया, उनके परिवारों को सार्वजनिक रूप से सड़कों पर ला दिया; इस सम्पूर्ण अपराध को ‘मानवीय दृष्टि’ से अधिक देखा गया। जबकि इन घटनाओं को, घटना में लिप्त पुलिसकर्मियों को ‘क्रिमिनल’ समझकर न्यायपालिका को देखना चाहिए थे। न्यायपालिका यह देखने लगी की जिनके साथ यह घटना घटी है, उनके डाक्टरी जांच हुई या नहीं, आखों पर पट्टी बंधा या नहीं, दवाई लिखा गया या नहीं, दवाई खाया या नहीं …… क्या यह कार्य न्यायपालिका का है ? यानी सभी ‘चेरिटेबल एंगल’ से अपराध और अपराधी को देखने लगे। जो वास्तविक अपराधी था, उसके विरुद्ध जो कार्रवाई होनी चाहिए थी, अपेक्षा से बहुत कम हुई।
बाद में जब यह मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो के पास आया, मुकदमा दाखिल हुआ।कोई 15 पुलिस अधिकारियों को आरोपित बनाते हुए न्यायिक कार्रवाई शुरू हो गई, जिसमें से 14 पुलिस पदाधिकारी ने आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ लोगों को सजा हुई। लेकिन चुकी पूरे प्रकरण में ऊपर से नीचे तक अधिकारी से नेता तक शामिल थे, बहुत लोग एक्विटेड हो गए। जिनकी आँखें चली गयी उनके जीवन के सामने अन्धकार छा गया; उनकी फरियादों को भारत के ‘विधि निर्माताओं’ से लेकर ‘विधि अनुपालकों के रास्ते’ देश के न्यायिक व्यवस्था में “समग्रता के साथ क़ानूनी-रूप” से नहीं देखा गया, जांचा गया, परखा गया; बल्कि “मानवीयता” दिखाकर संविधान के तहत प्रदत उनके अधिकारों से उन्हें वंचित रखा गया।” जिस समय यह घटना घट रही थी, उस समय रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री थे। राम सुन्दर दास 21 अप्रैल, 1979 को मुख्यमंत्री के पद पर आसीन हुए थे और 17 फरवरी, 1980 तक कुल 302 दिन विराजमान रहे। उस समय तक यह जुल्म प्रारम्भ हो गया था कमोवेश, लेकिन प्रकाश में नहीं आ पाया था। फरवरी 17, 1980 से राष्ट्रपति शासन लगा और शासन 8 जून, 1980 को समाप्त हुआ, जब प्रदेश का कमान डॉ जगन्नाथ मिश्र के हाथों आया। इन दिनों भागलपुर में आँख फोड़ने और उसमें तेज़ाब डालने की प्रक्रिया चल रही थी। खासकर जब प्रदेश में राष्ट्रपति शासन था, पुलिस की शक्ति भी उत्कर्ष पर थी, जिसका फायदा उसने उठाई थी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति ने पुनर्वास के लिए भी आदेश दिए। पीड़ितों के नाम से 30-30 हज़ार रुपये स्टेट बैंक में जमा कराये गए और मुआवजे के तौर पर उन्हें, उनके परिवार को 750/- रुपये प्रतिमाह देने का आदेश दिया गया। मानवीय दृष्टि से वह सब कुछ हुआ – परन्तु वह नहीं हुआ जो होना चाहिए था – क़ानूनी तौर पर न्याय यानी अपराधियों को सजा देना कानून का काम है लेकिन अपराधियों के लिए खुद के हाथों में अपराध लेना, ये कहीं से उचित नहीं है।

अरुण सिन्हा कहते हैं: “भागलपुर की अमानवीय घटना जब उत्कर्ष पर थी, तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी पटना आई थी। इंदिरा गांधी भागलपुर की घटना के कारण बहुत दुखी थी। उनके देश का नाम विश्व के पटल पर कलंकित हो रहा था। विश्व के शीर्षस्थ नेता उनसे पूछ रहे थे। इंदिरा गांधी भागलपुर की घटना को देश के साथ जोड़ रही थी। उनके लिए यह घटना देश की प्रतिष्ठा को दाव पर लगा दिया था, कलंकित कर दिया था। भारत का नाम बदनाम हो गया था। पटना एरोड्रोम पर डॉ मिश्र को बहुत फटकार लगा। वे उन्हें अपने साथ बैठने तक नहीं दीं। हवाई जहाज में चढ़ने तक नहीं दीं।
एरोड्रोम पर पत्रकारों की संख्या भी बहुत कम थी। जैसे ही डॉ मिश्र मुझे देखे जोर से कहने लगे… …बाप रे बाप ….क्या कर दिया आपने ? जगन्नाथ मिश्र की सोच अपने प्रदेश तक सीमित थी। उन्हें अपनी कुर्सी की चिंता थी। उधर भागलपुर की पुलिस की सोच प्रदेश के राजनीतिक और भौगोलिक सीमा तक सीमित था और न्यायालय तो चेरिटेबल एंगल से सम्पूर्ण घटना को देख ही रहा था। कुल मिलाकर सभी अपने-अपने दृष्टि से घटना को देख रहे थे। कोई बदनामी की नजर से तो कोई राजनीती की नजर से। लेकिन “कानून” में उद्धृत नियमों के तहत दोषियों को कड़ी-से-कड़ी सजा हो, कोई नहीं सोचा रहा था, कोई नहीं देख रहा था ।”
कहानी जारी है … ✍
