सम्मानित श्रीमती रेखा गुप्ता जी,
मुख्यमंत्री,
दिल्ली सरकार
विषय: दिल्ली में दारु के ठेके, बोतलों की खपत की गिनती करने वाले भवन से मैथिली-भोजपुरी अकादमी को या तो हटा कर कृतार्थ करें या फिर यमुना में विलय कर इन अमूल्य भाषाओँ का सम्मान करें। विगत 18 वर्षों से दारू के दुर्गन्ध से भाषा व्यथित हो रही है। आप तो 'शिक्षित' हैं। भाषाओँ की गरिमा समझती हैं - तदर्थ
माननीया,
आशा है आप स्वस्थ होंगी और आपके नेतृत्व में दिल्ली का जनमानस भी स्वस्थ और सुरक्षित महसूस करता होगा।
माननीया, विगत डेढ़ महीनों में प्रधानमंत्री सम्मानित नरेंद्र मोदी जी बिहार की यात्रा तीसरी बार कर रहे हैं। आप तो जानती ही हैं। मिथिला, भोजपुरी और अंग प्रदेश के लोगों के बीच प्रधानमंत्री अपनी उपस्थिति दे रहे हैं, लगातार। स्वाभाविक है इन क्षेत्रों का प्रदेश की राजनीतिक मानचित्र पर कितना महत्व है, आप समझती होंगी।
आज भी प्रधान मंत्री जहाँ भ्रमण सम्मेलन करने गए थे, यह मोतिहारी जिला है और पूर्वी चम्पारण का मुख्यालय भी। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से मोतिहारी का महत्व इसी बात से लगा सकती हैं कि यह क्षेत्र देवी सीता के पिता राजा जनक के साम्राज्य का अभिन्न अंग था। मोहनदास करम चंद गांधी भी अंग्रेजों के विरुद्ध यहीं से राजनीतिक लड़ाई की शुरुआत किये थे। इसी क्षेत्र के लोगों ने मोहनदास करम चंद गाँधी को 'महात्मा' की उपाधि से अलंकृत किया था और वे 'जीवन पर्यन्त' और जीवन के बाद भी महात्मा गाँधी' बने रहे।
माननीया, प्रधानमंत्री साल 2014 के बाद बिहार के जिन-जिन क्षेत्रों में भ्रमण सम्मेलन किये हैं वे मूलतः भोजपुरी और मैथिली भाषा बोलने वालों का गढ़ है। मेरे मानना है कि प्रधानमंत्री भले ही राजनीतिक दृष्टि से इन इलाकों में जाते हों, लेकिन इस बात से इंकार नहीं कर सकते हैं कि वे पांच शब्द ही सही, वहां की स्थानीय भाषाओँ में बोलकर, उसकी अहमियत देकर, लोगों को हतोत्साहित नहीं बल्कि प्रोत्साहित करते हैं, भाषा की महत्व को उजागर करते हैं। राजनीति में लोग उन्हें चाहे जो भी कहते हों।

लेकिन, माननीया मुख्यमंत्री जी। आपके राज्य में मैथिली और भोजपुरी भाषा का जो हश्र है, वह न केवल; चिंतनीय है, बल्कि निंदनीय भी है। शब्द कर्ण प्रिय नहीं हैं, लेकिन सत्य है। मैं संवाददाता के रूप में मैं विगत पांच दशकों में जहाँ-जहाँ कार्य किया, पत्रकारिता का क, ख, ग सीखा, सच बोलना और लिखना ही सीखा, तदर्थ यह पत्र लिख रहा हूँ।
यह बात इसलिए लिख रहा हूँ कि जिस भवन में शराब की बोतलों की गिनती होती हैं, बोतलों की बिक्री से एकत्रित पैसों की गिनती होती है – उसी भवन के नीचले तल्ले के कोने में “मैथिली-भोजपुरी अकादमी” स्थित है। भवन का नाम है – 7-9 आपूर्ति भवन, आराम बाग़, पहाड़गंज, नई दिल्ली। वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें। ‘मैथिली-भोजपुरी अकादमी’ में बैठने वाले कर्मचारी ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा को शायद अपने जीवन में कभी नहीं सुने होंगे। वैसी स्थिति ‘विद्यापति’ और ‘भिखारी ठाकुर’ बारे में पूछना कुल्हाड़ी पर अपना पैर पटकना है।
माननीया, अगर तत्कालीन कांग्रेस की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित (ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें) मैथिली-भोजपुरी भाषा और अकादमी की महत्ता के मद्देनजर 'दारू वाले भवन' में ही स्थान दीं 'अकादमी' को, उसके बाद आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल, उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया या मंत्री सौरभ भारद्वाज भी इन भाषाओँ का राजनीतिकरण कर दारू वाले भवन में ही दोनों भाषाओँ को गटकने के लिए छोड़ दिए; उनकी तुलना आपसे नहीं कर सकता हूँ।
वे दोनों तो बिहार-झारखण्ड-उत्तर प्रदेश और नेपाल की तराई वाले क्षेत्रों से विस्थापित लोगों का महान धार्मिक पर्व ‘छठ’ में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन करने का जवाबदेही एक ‘टेंट हाउस’ को भी दिए, अकादमी के अधिकारी, कर्मचारी भी ऐसे ही हैं, जहाँ तक अकादमी के महत्व को समझने का सवाल है; लेकिन आप से ऐसी उम्मीद नहीं है। क्योंकि भारत में मैथिली और भोजपुरी भाषाओँ की गरिमा भारतीय संस्कृति के बराबर ही है। इस बात को इस अकादमी से जुड़े वे लोग नहीं समझेंगे जो राजनीतिक लाभार्थ इस संस्थान से जुड़े हैं। या भारतीय प्रशासनिक सेवा के वे अधिकारी भी नहीं समझेंगे, जो 'मैथिली' और 'भोजपुरी' भाषाहों को अपनी परीक्षा का विषय बनाकर परीक्षा में अधिकाधिक अंक लेकर अधिकारी तो बन जाते हैं, लेकिन इन भाषाओँ के प्रति 'आत्मा से मृत' हो जाते हैं।
यह पत्र इसलिए लिख रहा हूँ कि आप जिस समय कॉलेज में और बाद विश्वविद्यालय छात्र संघ के लिए चुनाव लड़ रही थी, मैं इंडियन एक्सप्रेस अख़बार का संवाददाता था। अनेकों कहानियाँ लिखा था विश्वविद्यालय पर, चुनाव पर और आप पर भी । आप उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम महाविद्यालय की छात्रा थीं और अपने महाविद्यालय में प्रतिनिधित्व कर रही थी। आप राजनीति में पुरुषों के तेवर को आंक चुकी थी और इस बात से भी भिज्ञ हो गयी थीं कि ‘इस पुरुष प्रधान राजनीतिक व्यवस्था में एक महिला को नेतृत्व करना कितना दुःखमय होता है। लेकिन आप हिम्मत नहीं हारी।
आपको शायद याद होगा, सितम्बर 19, 1994 को अपरान्ह 2 बजकर 15 मिनट में राजौरी गार्डन के प्रथम प्राथमिकी पुस्तिका के पृष्ठ संख्या 18 पर प्रथम प्राथमिकी संख्या 573/94 लिखा जा रहा था। आपको ज्ञात नहीं था कि अगले वर्ष आप दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की महासचिव बनेंगी और उसके अगले वर्ष विश्वविद्यालय छात्र संघ की अध्यक्ष। शायद आपको यह भी ज्ञात नहीं था कि उस तारीख से 31 वर्ष बाद जब पहली बार दिल्ली विधान सभा की विधायिका चुनी जाएँगी, उसी चयन के साथ वे प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनेंगी। इसी को कहते ‘भाग्य’ कहते हैं। मैं राजौरी गार्डन पुलिस मुठभेड़ की कहानी किया था अपने अखबार इंडियन एक्सप्रेस में।
महोदया,
आपका ध्यान मैथिली-भोजपुरी अकादमी की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। साल 2008 में ‘राजनीतिक उद्देश्य' से ही सही, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित द्वारा मैथिली-भोजपुरी अकादमी की स्थापना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुई। दिल्ली से साथ संसदीय और 70 विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले मैथिली-भोजपुरी भाषा-भाषियों को शायद लगा होगा कि इसकी स्थापना से राजधानी में मैथिली व भोजपुरी भाषाओं के साथ-साथ साहित्य और संस्कृति का उन्नयन और पल्लव होगा। यह अलग बात है कि बिहार में मैथिली अथवा भोजपुरी बोलने वालों लोगों की किल्लत हो गई है। शहरीकरण के बाद गाँव से पलायित लोग न तो मैथिली बोलते हैं और ना ही भोजपुरी। विश्वास नहीं हो तो शहर घूमकर देख लीजिये। मैथिली-भोजपुरी अकादमी में गैर-मैथिल-भोजपुरी भाषा भाषी राज कर रहे हैं। जो वरिष्ठ अधिकारी है उनके कंधे पांच-छः विभाग है। कुछ विभाग तो ‘दुधारू’ भी है और दूध तो भारत पीता है। वजह भी है। गाँधी की विचारधारा से बहुतों को परहेज है, लेकिन कागज पर मुद्रित गांधी से सभी को प्रेम हैं।
शायद मिथिलांचल और भोजपुरी इलाकों से रोजी रोजगार, शिक्षा हेतु पलायित बिहार के मतदाता (उन दिनों) जो बाद में दिल्ली के मतदाता होते चले गए, शायद यह सोचे होंगे यह अकादमी विलुप्त होती लोक-संस्कृति के उन पक्षों को प्रबल करेगा जिनकी मूल्यवत्ता की कीमत बची हुई है। लेकिन विगत इन वर्षों में दिल्ली शहर में मिथिला, मैथिली भाषा, भोजपुरी भाषा अथवा संस्कृति का कितना विकास हुआ, किन-किन विलुप्त होती संस्कृति को यह बचा पाया, यह बात दिल्ली में रहने वाले करोड़ों लोग, मतदाता, अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री, राजनेता या वे सभी लोग जो इससे ताल्लुकात रखते हैं, अपने कलेजे पर हाथ रखकर प्रश्न कर सकते हैं, उत्तर पा सकते हैं।

दिल्ली ही नहीं राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मैथिली और भोजपुरी भाषाओं का क्या हश्र है, यह एक गहन शोध का विषय है। लेकिन यह शोध करेंगे कौन? यह भारत में रहने वाले करीब साढ़े तीन करोड़ मैथिली और करीब साढ़े पांच करोड़ भोजपुरी भाषा भाषी स्वयं अपने कलेजे पर हाथ रखकर स्वयं से पूछ सकते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ की मान्यवर भिखारी ठाकुर और मान्यवर विद्यापति मृत्यु को प्राप्त कर लिए। अन्यथा आज मैथिली और भोजपुरी भाषाओं को देश की राजधानी से लेकर गाँव के खेत खलिहानों तक देखकर मृत्यु को प्राप्त कर लेते।
वस्तुतः जब बिहार के मिथिला क्षेत्र में मिथिला के लोग मैथिली भाषा को नहीं बचा सके, मिथिला की संस्कृति को नहीं बचा सके, फिर मिथिला क्षेत्र के बाहर हम मैथिली भाषा और संस्कृति की बात, उसे बचने की बात कैसे कर सकते हैं? क्या दिल्ली सल्तनत के किनारे प्रदूषित यमुना नदी में मैथिली या भोजपुरी गीत-संगीत का ढ़ोल-नगारा पीटकर बचा सकते हैं। छठ पर्व के अवसर पर गैर-मैथिली-भोजपुरी भाषाओँ और सिनेमा के धुनों पर आधारित रंगारंग संगीत से मैथिली-भोजपुरी संस्कृति बच सकती है? इतना ही नहीं, मैथिली भाषा और भोजपुरी भाषा दोनों अलग है, दोनों की गहराई हिंदमहासागर जैसी है। और दिल्ली में इन दोनों भाषाओँ को एक अकादमी बनाकर दिल्ली सरकार द्वारा संचालित दारू की दूकानों, बोतलों, खरीद-बिक्री, लाभ-हानि का जोड़-घटाव किया जाता है वाले भवन के कोने पर स्थापित कर दिया गया।
जिस स्थान पर मैथिली-भोजपुरी अकादमी स्थित है, जिस स्थान पर रात के अँधेरे में वहां रखी वाहनों के बीच लघुशंका से लोग बाग निवृत होते हैं, उस अकादमी में बैठे अधिकारियों की सोच भी तो वैसी ही होगी । इस दृष्टि से दिल्ली सरकार, दिल्ली प्रशासन, दिल्ली में रहने वाले मैथिली और भोजपुरी भाषा भाषी लोगों का इस अकादमी के प्रति मान-सम्मान है, यह भी स्पष्ट दिखा है। आखिर यहाँ कार्य करने वाले अधिकारी क्या कर सकते हैं ? जब सरकार की नजर में, जिनके लिए यह अकादमी बनाया गया, जिस उद्देश्य की पूरी के लिए बनाया गया – महत्वहीन है, तो उसकी देखरेख करने वाले क्या कर सकते हैं?
चलिए पहले दारू का हिसाब-किताब करते हैं फिर छठ के नाम पर टेंट वाले को दिए गए सांस्कृतिक कार्यक्रम करने की बात करेंगे। दिल्ली सल्तनत में कुल 573+12 = 585 शराब के ठेके हैं। कुछ ठेके/दुकानें दिल्ली के मॉलों में भी स्थित है। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित कुल 2400 विद्यालय हैं और नगर निगम द्वारा संचालित विद्यालयों की संख्या 1735 है। यानी कुछ 4135 विद्यालय हैं। अब अगर दिल्ली सरकार की शराब की दुकानों (585) और शिक्षा निदेशालय के विद्यालयों की सांख्यिकी (2400) की तुलना करें तो औसतन चार सरकारी विद्यालयों पर एक एक सरकारी शराब का ठेका है। परन्तु कोई भी सरकारी ठेका विक्रेता से लेकर शराब-मादक-मदिरा से जुड़े विभाग और मंत्रालय की कोई भी कुर्सी खाली नहीं है।
इतना ही नहीं, दिल्ली सरकार का प्रत्येक शराब का ठेका ‘आधुनिक साज सज्जा’ से लैस है, जबकि सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों में ‘प्राचार्य’, ‘हेड-मास्टर’ ‘वरीय शिक्षकों’ की बात तत्काल नहीं करें तो ‘डस्टर’, ‘पेन्सिल’, ‘मानचित्र’, ‘झाडू’, ‘कुर्सी’, ‘किताब’, ‘पेन्सिल’ की घोर किल्लत है। हालांकि अंदर के लोग यह कहते हैं कि ‘स्थान तो कागज पर रिक्त है लेकिन निजी क्षेत्र से ठेका प्रथा के अधीन लोगों को भर दिया गया है।’ विगत दिनों नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स (एनसीपीसीआर) ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव को एक पत्र लिखा था। नगर निगमों की विद्यालयों को छोड़ दें तो दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय द्वारा संचालित 1024 विद्यालयों के एक अध्ययन के अनुसार में सिर्फ 203 विद्यालयों में प्राचार्य अथवा विद्यालय के सर्वोच्च अधिकारी हैं। यानी 2400 विद्यालयों में से 1024 विद्यालयों में से 824 विद्यालयों में सर्वोच्च अधिकारी नहीं हैं।

एनसीपीसीआर ने तो पत्र में यह भी लिखा था कि ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ की बात यदि छोड़ भी दें, तो अधिकांशतः विद्यालयों में विद्यालय प्रमुख (Head of School-HoS) की कुर्सी खली होने के कारण परिसर के किसी कोने में राखी दिखी। वैसे दिल्ली सरकार और सरकार के आला अधिकारी भी कम चालाक नहीं हैं। तक्षण उन्होंने इस जबाबदेही को दिल्ली सल्तनत के उपराज्यपाल के मथ्थे मढ़ दिया। कहने में तनिक भी देर नहीं किये कि प्राचार्यों/सर्वोच्च पदाधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार उपराज्यपाल के पास है। इसी को राजनीति कहते हैं।
यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि दिल्ली की वर्तमान आबादी (32,941,000) में पियक्कड़ों की संख्या उम्मीद से अधिक है। यह बात भी अलग है कि सरकार शराब की बोतलों पर अंग्रेजी में, हिंदी में, पंजाबी में, उर्दू में, चाहे जिस भाषा में लिखकर चिपकते रहे – शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैसे अलग बात है कि विगत दिनों दारू की दुकानों को लेकर दिल्ली सरकार और उसके मंत्री, संत्री, आला अधिकारी सभी चर्चा में रहे, जांच के अधीन हैं । अख़बारों में और टीवी पर सुर्खियों में रह रहे हैं । लेकिन बावजूद इसके दिल्ली सल्तनत में दिल्ली सरकार 2022-2023 वित्तीय वर्ष में 762 करोड़ और अधिक शराब से भरी बोतलों को बेचकर 6,821 करोड़ रुपये सरकारी कोष में जमा की। मज़ाक बात नहीं है इतनी राशि का एकत्रीकरण ।
इतना ही नहीं, अगर इन शराब के बोतलों को गिनने वाले स्थान पर किसी ‘उम्दा भारतीय भाषाओँ का अकादमी’ भी खोल दें तो उस भाषा को बोलने वालों को, लेखकों को, सम्बद्ध लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर ऐसा नहीं होता तो शराब नियंत्रण कक्ष में ‘मैथिली-भोजपुरी अकादमी’ कराहता नहीं। आखिर भाषा की उन्नति पर विचार तो शराब पर चर्चा के बाद ही होगा। इसी को कहते हैं भाषा के नाम पर राजनीति।
मिथिला के लोग अगर वास्तविक रूप में मिथिला के विकास के लिए प्रखर होते तो आज मिथिला वहां तो अवश्य नहीं होता, जहाँ आज है। मिथिला के राजा और उनके पूर्वज भी स्वर्ग से अपने मिथिला को देखकर अश्रुपूरित होते होंगे। कल के मिथिला में विद्वानों-विदुषियों का भरमार था, आज चापलूसों, चाटुकारों की बाढ़ है। हज़ारों-हज़ार संस्थाएं मिथिला के विकास करने में लगे हैं। लेकिन खुद मेहनत से अधिक विकसित हो रहे हैं और मिथिला अपने भाग्य पर रो रही है। वैसी स्थिति में दिल्ली सरकार के लिए ‘मैथिली’ और ‘भोजपुरी’ भाषा की क्या अहमियत है आप स्वयं निर्णय करें।
अब अकादमी की संस्कृति बचाने सम्बन्धी प्रयास के बारे में चर्चा करते हैं। विगत दिनों अखबारवाला001 यूट्यूब के लिए कहानी करने के क्रम में घंटों मैथिली-भोजपुरी अकादमी में था। मैं मैथिली और भोजपुरी अकादमी देख, मैथिली और भोजपुरी भाषा में बात करना चाहा। शुरुआत भी किया। लेकिन भवन के सबसे अंत वाले कमरे के सामने कोने में बैठे सज्जन मेरा मुख देख रहे थे। ज्ञान हुआ कि उन्हें इन भाषाओँ के बारे में कोई ज्ञान नहीं है। जब उनसे पूछा कि यहाँ आने वाले लोगों से आप कैसे बात करते हैं? वे कहते हैं ‘हिंदी’ में। मेरा कलेजा दो फांक यहीं हो गया। आगे उनका कहना था कि 26 जनवरी या 15 अगस्त को सौ-दो सौ लोग आते हैं। झंडोत्तोलन करते हैं। उसके बाद पुरे साल लोगों का आना-जाना नगण्य ही होता है। मुझे अकादमी की सार्थकता का दिव्य ज्ञान हो गया।
वैसे दिल्ली में पत्रकारों की किल्लत नहीं है, परन्तु एक संवेदनशील पत्रकार होने के नाते, आपको महाविद्यालय के जीवनकाल से जानने के नाते यह पत्र लिख रहा हूँ। मिलकर कह नहीं पाता क्योंकि सचिवालय में चतुर्दीक यह धारणा व्याप्त है कि आप उन्हीं से मिलती हैं जिन्हें आप नाम से जानती है। मैं आपको जानता हूँ, इसलिए लिख रहा हूँ। यह आवश्य नहीं है कि आप मुझे जानती हों। अगर पत्र ह्रदय विदारक हो, आपको अच्छा नहीं लगा हो तो क्षमा कर देंगी। क्योंकि आप आज गाँठ बाँध लें - मैथिल किसी के नहीं होते हैं। जब तक आप सत्ता में हैं, आपके इर्द-गिर्द मधुमक्खी जैसा रहेंगे, हाँ-में-हाँ करते रहेंगे - अपने लाभार्थ। क्योंकि अगर मैथिल मिथिला के ही होते तो शायद न तो मिथिला का यह हश्र होता और ना ही मैथिली भाषा बिलखती।
अंततः, जो अधिकारी, पदाधिकारी सामाजिक क्षेत्र के मीडिया 'फेसबुक' पर 'मैथिली - भोजपुरी अकादमी' का पृष्ठ बनाये, चलते हैं, उन्हें आगाह कर दें कि 'अब केजरीवाल मुख्यमंत्री नहीं हैं, मनीष सिशोदिया जी अब उप-मुख्यमंत्री नहीं हैं; क्योंकि आज भी पृष्ठ पर चमप रहे है। साथ ही, 2008 और 2025 के बीच की बातों को मैथिली-भोजपुरी अकादमी वेबसाइट पर चिपके अब तक 14 तस्वीरें। वेबसाइट पर अंकित शब्द इस बात की व्याख्या करता है कि दिल्ली की भाषाई संस्कृति के अनिवार्य अंग के रूप में मैथिली-भोजपुरी भाषा एवं साहित्य का परिरक्षण एवं अभिवृद्धि करना है और दो दर्जन से अधिक वचनवद्धता लिखा है; लेकिन माननीया यह भी लिखा है 'सञ्चालन समिति - कोई डाटा मौजूद नहीं है,' 'समाचार अद्यतन - कोई डाटा मौजूद नहीं है।

आप शिक्षित है। दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र रही हैं जहाँ पढ़ने के लिए भारत की छात्राएं तरसती हैं। आप प्रार्थना है कि पहले: दारू वाले भवन से मैथिली-भोजपुरी अकादमी' को मुक्त कर अकादमी में इन भाषाओँ के प्रति 'वेदना और संवेदना रखने वाले महिला-पुरुषों को स्थान दें। भाषा कलम से बच सकती है।
आपका शुभचिंतक
शिवनाथ झा
एक छोटा सा अखबारवाला
