धनबाद / नई दिल्ली: झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शिबू सोरेन 4 अगस्त, 2025 को अंतिम सांस लिए। चार दिन बाद 8 अगस्त, 2025 को भारत का सर्वोच्च न्यायालय धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह समेत चार लोगों की हत्या के आरोप में हवालात में बंद पूर्व विधायक संजीव सिंह को 'शर्तनामा बेल' प्रदान किया। उन्नीस दिन बाद, यानी 27 अगस्त, 2025 को धनबाद न्यायालय के एक विशेष न्यायाधीश दुर्गेश चंद्र अवस्थी ने आठ साल पुराने बहुचर्चित नीरज सिंह हत्याकांड के मामले में फैसला सुनाते हुए संजीव सिंह और सह-आरोपियों जयेंद्र सिंह उर्फ पिंटू सिंह, डबलू मिश्रा, विनोद सिंह, सागर सिंह उर्फ शिबू, चंदन सिंह, कुर्बान अली, पंकज सिंह और रणधीर धनंजय उर्फ धनजी को बरी कर दिया। फैसले के दौरान संजीव सिंह भी अदालत में मौजूद थे।
नीरज सिंह के साथ मारे गए अशोक यादव के परिजन कोर्ट के इस फैसले से नाराज हैं। अशोक यादव के पुत्र शुभम मीडिया कर्मियों से कहा कि अगर सभी आरोपी निर्दोष है तो उनके पिता की हत्या किसने की है? इसका जवाब कौन देगा? न्यायालय से उम्मीद थी, लेकिन अब सभी उम्मीद भी खत्म हो गई है। वे लोग आठ साल की घूंट-घूंट कर जी रहे हैं। इस शहर से उन लोगों को जीवन भर दर्द दे दिया है। यहां रहने का भी मन नहीं करता है। यह शहर काटने को दौड़ता है।
नीरज सिंह के वाहन चालक चंद्र प्रकाश महतो उर्फ घल्टू की पत्नी मीना देवी कहती हैं कि न्यायालय से उन्हें इंसाफ नहीं मिला है। जिन लोगों ने चार लोगों की हत्या की है और हमारे घर को बर्बाद किया है, उन्हें सजा मिलनी चाहिए थी। इस पर न्यायालय को पुनर्विचार करना चाहिए। मीना देवी अपने दोनों पुत्र और एक अविवाहित ननद ससुर के साथ रहते हैं। पति की मृत्यु के बाद आर्थिक स्थिति का चरमराना स्वाभाविक है। उनके अनुसार उनके जीवन का काला दिन 21 मार्च 2017 से शुरू हो गया जब उनके पति समेत चार लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई थी।
संजीव सिंह के अधिवक्ता मोहम्मद जावेद का कहना है कि "यह एक ऐतिहासिक फैसला है। स्थानीय पुलिस इस कांड की जांच सिर्फ एक स्थान पर केंद्रित रखी। 21 मार्च 2017 को घटना हुई। करीब 48 घंटे बाद प्रथम प्राथमिकी लिखी गयी। यह भी एक रहस्य है। पुलिस अपनी जांच में करीब 21 परिजनों को अलग रखी। इतना ही नहीं चार-चार चश्मदीद गवाह होने के बाद भी जब जुडिसियल स्क्रूटिनी हुआ, कोई भी खड़ा नहीं उतरा। पुलिस पुरे मामले में तथ्य एकत्रित नहीं कर पाई जिससे आरोपियों को सजा मिले।" उधर, नीरज सिंह के छोटे भाई अभिषेक सिंह के अनुसार वे इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देंगे। वह रांची से एम्बुलेंस से कोर्ट परिसर आए थे।

बहरहाल, स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही न्यायालय में न्यायाधीश दुर्गेश चंद अवस्थी का आदेश जारी हुआ, उधर संजीव सिंह की झरिया से विधायक पत्नी श्रीमती रागिनी सिंह झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक दिवंगत शिबू सोरेन के पुत्र, जो वर्तमान में प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं, के पास फल-फूल-मिठाई लेकर पहुँच गयी और कहने लगीं: "सच्चाई की जीत हुई। न्यायालय द्वारा मेरे पति व पूर्व विधायक संजीव सिंह जी को बाइज़्ज़त बरी किए जाने की खुशी में विधानसभा सत्र के बाद विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो जी, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी,नेता प्रतिपक्ष श्री बाबूलाल मरांडी जी एवं सभी माननीय विधायकों से मुलाकात कर मिठाई खिलाकर इस खुशी को साझा की। आप लोगों के आशीर्वाद व समर्थन से यह सम्भव हुआ।"

आप सभी ज्ञानी हैं, महात्मा हैं, राजनीतिक विशेषज्ञ हैं, न्याय विशेषज्ञ हैं, इस विषय को अधिक समझेंगे।
21 मार्च 2017 की शाम को नीरज सिंह अपनी फार्च्यूनर जेएच10एआर-4500 से रघुकुल स्थित आवास लौट रहे थे। सरायढेला के स्टील गेट के पास बने 15 स्पीड ब्रेकर के कारण गाड़ी धीमी हुई और तभी घात लगाए बाइक सवार हमलावरों ने गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। एके 47, कारबाइन और 9 एमएम पिस्टल से हुई अंधाधुंध फायरिंग में 50 से अधिक गोलियां चली। पोस्टमार्टम में नीरज सिंह के शरीर से 17 गोलियां बरामद हुईं। उनके साथ मौजूद ड्राइवर ललटू महतो, साथी अशोक यादव और बॉडीगार्ड मुन्ना तिवारी की मौके पर मौत हो गई। नीरज सिंह, यूपी के बलिया के पूर्व विधायक विक्रमा सिंह के भतीजे थे। उनके चचेरा भाई संजीव सिंह उस समय झरिया से बीजेपी विधायक थे। राजनीतिक व कारोबारी रसूख के कारण इस हत्याकांड के पीछे बड़े पैमाने पर साजिश की आशंका जताई गई थी।

हत्या की खबर फैलते ही धनबाद में तनाव फैल गया। समर्थक सड़क पर उतर आए, बाजारों में अफरा-तफरी मच गई। झरिया और सरायढेला समेत कई जगहों पर दुकानों के शटर गिरा दिए गए। सड़क जाम और पथराव की घटनाओं के बीच पुलिस को भारी संख्या में बल तैनात करना पड़ा और धारा 144 लागू करनी पड़ी। धनबाद की गलियों में उस दिन गूंजे गोलियों के धमाके आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं। लेकिन फैसले के बाद उठ रहे सवाल इस काले अध्याय को और भी गहरा कर देते हैं। यह मामला अब सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि पुलिस अनुसंधान उठे सवालों का प्रतीक बन गया है।

आठ साल बाद जब अदालत ने कई आरोपियों को बरी कर दिए, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर नीरज सिंह की हत्या किसने की? पुलिस की जांच पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। दो बार के भाजपा झरिया विधायक (2009 और 2014) संजीव सिंह को 12 अप्रैल, 2017 को हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने अपने चचेरे भाई और ट्रेड यूनियन प्रतिद्वंद्वी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में अपने तीन सहयोगियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था। बहरहाल, झरिया की पूर्व विधायिका और दिवंगत नीरज सिंह की पत्नी श्रीमती पूर्णिमा सिंह, उनके छोटे भाई अभिषेक सिंह, झरिया के वर्तमान विधायिका श्रीमती रागिनी सिंह, सिंह मैंशन के कोई भी सदस्य फोन का जवाब नहीं दिए।जबकि निचली अदालत द्वारा जारी आदेश पर अनेकानेक प्रश्न उठ रहे हैं।


कभी शांति का माहौल था सिंह मैन्सन में
सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद, विगत तीन दशकों में उनके ऐतिहासिक ‘सिंह मैन्सन’ की एकीकृत शक्ति का सहस्त्र खंड होना, भाई-भाई का दुश्मन होना, दुश्मनी से धनबाद-झरिया का लहू-लहान होना, परिवार में पुरुषों की संख्या का उत्तरोत्तर कम होते जाना, झरिया विधानसभा क्षेत्र के साथ-साथ अपने अस्तित्व को कायम रखने के लिए परिवार की महिलाओं का राजनीतिक कुरुक्षेत्र में उतरना, सत्ता में वर्चस्व बनाने के लिए चाणक्य की नीतियों को व्यावहारिक रूप देना – आज एक गहन शोध का विषय हो गया है कोयलांचल में। बातों और तथ्यों को जब एक साथ देखता हूँ तो सूर्यदेव सिंह का अपने परिवार, परिवार के लोगों पर उनका विश्वास खंडित दिखता है। जीते जी वे सही थे अथवा नहीं, यह वे ही जानते थे, लेकिन मृत्यु के बाद वे गलत सिद्ध हो गए, यही सत्य है।
सूर्यदेव सिंह का कहना था कि उनके सभी भाइयों में बहुत एकता है। उनके लिए बिक्रमा सिंह, रामाधीर, बच्चा सिंह, राजन सिंह सभी भाई ही नहीं, भाई से बढ़कर हैं। ह्रदय का रिश्ता है सबों में। सभी एक दूसरे के प्रति समर्पित हैं। हमारा खून का सम्बन्ध तो है ही, उससे भी बढ़कर भावनात्मक और संवेदनात्मक सम्बन्ध है। अगर हम सभी झरिया को छोड़ देंगे तो कोई और लपक लेगा। प्रकृति का यही नियम है। झरिया हमारी कर्मभूमि है। हम सबों की पहचान है। झरिया में हम सबों की परछाई साथ नहीं छोड़ती, बल्कि दिखती थी। सूर्यदेव सिंह के देहावसान के बाद सभी रिश्ते तीतर-बितर हो गए।

आज 34-वर्ष बाद जब सूर्यदेव सिंह की अन्तःमन की बातों को याद करता हूँ, उन शब्दों पर विचार करता हूँ, शोध करता हूँ और सोचता हूँ तो समस्त बातें, एक-एक शब्द गलत लगता है। यह भी सोचने पर विवश हो जाता हूँ कि अपनी अंतिम सांस के बाद सूर्यदेव सिंह अपने सभी रिश्तों के साथ अनंत यात्रा पर निकल गए। वेदना, संवेदना, भावना सभी उनके वियोग में सिंह मैन्सन में मिट्टी में मिल गए। अगर ऐसा नहीं होता तो सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद झरिया विधानसभा सहस्त्र विचारधाराओं के लोगों के हाथों नहीं फिसलता। आज सिंह मैंशन की सोच बिलकुल भिन्न है। आज झरिया के मतदाता, लोग दुःखी हैं।
सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद 1995 में श्रीमती आबो देवी (जनता दल) 45271 मतों से जीतकर विधायक हुई। अगले विधानसभा के चुनाव यानी 2000 चुनाव में सूर्यदेव सिंह के भाई बच्चा सिंह समता पार्टी के टिकट पर 56401 मतों से जीतकर झरिया विधानसभा के विधायक बने। इस चुनाव में आबो देवी (राष्ट्रीय जनता दल) को महज 14577 मत मिले।सन 2005 और 2009 के विधानसभा चुनाव में झरिया बच्चा सिंह के हाथ से फिसलकर सूर्यदेव सिंह की पत्नी श्रीमती कुन्ती सिंह के हाथ आ गयी। श्रीमती सिंह को क्रमश 43% और 40 % मत मिले थे। सन 2014 विधानसभा चुनाव में झरिया का भार माता कुंती अपने पुत्र संजीव सिंह को दे दी।
अब तक सूर्यदेव सिंह का सिंह मैन्सन, जो कभी ‘जनता मजदूरों’ के ‘संघ’ के रूप में जाना जाता था, ‘भारतीय जनता पार्टी’ के नाम से अंकित हो गया था। यह पहला ‘वैचारिक’ और ‘राजनीतिक’ पतन था सिंह मैंशन का। सूर्यदेव सिंह के कालखंड में जहाँ सिंह मैंशन सत्ता के गलियारे में एक निर्णायक भूमिका अदा करता था, कालांतर में अशिक्षा, बेहतर सोच, बेहतर लोगों के साथ बात-विचार की कमी के कारण अपने अस्तित्व को समेटने लगा, टकटकी निगाहों से प्रदेश और देश के राजनेताओं की ओर देखने लगा।
इधर समय बदल रहा था। सन 2014 के चुनाव में भाजपा के संजीव सिंह का टकराव कांग्रेस के अभ्यर्थी नीरज सिंह के साथ हुई थी। नीरज सिंह श्री राजन सिंह के पुत्र थे और श्री राजन सिंह सूर्यदेव सिंह के अपने सगे भाई थे। उस चुनाव में कांग्रेस के नीरज सिंह को भले 26 % मत पड़े थे और भाजपा के संजीव सिंह को 48 % मत, लेकिन टकराव आमने-सामने था। राजनीतिक लड़ाई इस कदर बढ़ी कि भाई-भाई का दुशमन हो गया। 21 मार्च 2017 को नीरज सिंह की हत्या हो गयी । कहते हैं उन्हें 67 गोलियां मारी गई थी। संजीव सिंह अपने चचेरे भाई नीरज सिंह की हत्या करने में दोषी पाए गए। वर्तमान में वे कारावास में हैं।
नीरज सिंह धनबाद के डिप्टी मेयर भी थे। विगत दिनों झारखण्ड उच्च न्यायालय ने संजीव सिंह की जमानत याचिका को रद्द कर दिया। झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस रंजन मुखोपाध्याय की अदालत ने संजीव सिंह की ओर से दायर जमानत याचिका पर तीन दिन पहले सुनवाई की थी। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों को सुनने के बाद संजीव सिंह की जमानत पर फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। अदालत इस मामले में 28 अक्टूबर को अपना फैसला सुनाने की बात कही थी। सूर्यदेव सिंह की बात यहाँ गलत सिद्ध हो गयी – सभी भाई संवेदनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हैं।
नीरज सिंह की हत्या के बाद उनकी पत्नी पूर्णिमा नीरज सिंह ने राजनीति में कदम रखा। उन्हें उनके दादा गिरीश नंदन सिंह भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी का आशीष मिला अपने जीवन निर्माण में। वे एक शिक्षिका भी रहीं। संचार-संवाद के क्षेत्र में स्नातकोत्तर की उपाधि भी ली। अपने पति के जीवनकाल में शायद अपने जीवन के बारे में कुछ और सोची होंगी, लेकिन समय कुछ और चाहता था। कहते हैं कि पूर्णिमा सिंह सामाजिक क्षेत्र में स्वामी विवेकानंद और ईश्वरचंद्र विद्यासागर को भी अपना आदर्श मानती हैं। वहीं साहित्य के क्षेत्र में विलियम वडर्सवर्थ , रामधारी सिंह दिनकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, माखनलाल चतुर्वेदी, विलियम शेक्सपीयर, जॉन मिल्टन और रवीन्द्रनाथ ठाकुर उनके आदर्श हैं।

सिंह मैन्सन की दो बहुएं और झरिया का काला सोना
2019 के चुनाव में झरिया विधानसभा में पहली बार दो महिला यानी सिंह मैन्सन की दो बहुएं – जेठानी और देवरानी – एक साथ झरिया की राजनीति में अपनी-अपनी किस्मत आजमाई थी – रागिनी सिंह और पूर्णिमा नीरज सिंह। सूर्यदेव सिंह के ज़माने में झरिया में महिला मतदाता तो थी, बहुत सम्मान करते थे सूर्यदेव सिंह और उनके सभी भाई, कार्यकर्त्ता; लेकिन महिला राजनीति में नहीं थी। पुरुषों का प्रभुत्व था। सन 2019 के चुनाव में ही झरिया में सूर्यदेव सिंह गलत सिद्ध हो गए। परंपरा आज भी जारी है। अगर सांख्यिकी को देखा जाय तो 2019 के चुनाव में कांग्रेस की पूर्णिमा नीरज सिंह को 79786 मत मिले थे (50.34 फीसदी), जबकि भाजपा के श्रीमती रागिनी सिंह को कुल 67732 मत (42.73 फीसदी) मिले थे। 2014 विधानसभा चुनाव में संजीव सिंह 74062 मत प्राप्त कर विजय हुए थे। विगत 2024 के चुनाव में श्रीमती रागिनी सिंह अपनी देवरानी पूर्णिमा नीरज सिंह को परास्त कर सूर्यदेव सिंह के झरिया को पुनः सिंह मैसन ले आयी।
रागिनी सिंह और पूर्णिमा सिंह कुछ आधारभूत फ़र्क़ है, शैक्षिक, पारिवारिक आदि। सबसे बड़ा फ़र्क़ है सामाजिक। एक तरफ़ पूर्णिमा सिंह जिस परिवार से आती हैं वह बहुत शिक्षित है। स्वयं भी अच्छी पढ़ी लिखी हैं। लेकिन रागिनी सिंह के साथ ऐसी बात नहीं है। वे सामान्य परिवार से आती हैं। शिक्षा में भी हाथ कमजोर है। सामाजिक दृष्टि से दोनों के पति हादसे के शिकार हुए। रागिनी सिंह के साथ हुई घटना – उनके पति राजीव रंजन सिंह संदिग्ध अवस्था में गायब हुए, पुलिस जांच-पड़ताल हुई, सीबीआई की भी जांच हुई, लेकिन नहीं मिले – के बाद सूर्यदेव सिंह का पूरा परिवार खड़ा हो गया। अपनी भाभी के सम्मानार्थ घर के सभी लोग उनका विवाह राजीव रंजन के छोटे भाई संजीव के साथ करा दी।
वैसे लोगों का कहना है कि पिछले हार के बाद रागिनी सियासत के हर रंग को समझ गयी थी। अपने पति के छोटे भाई सिद्धार्थ गौतम को मजदूर की राजनीति में पिता जैसा सबल बनाने की कोशिश कर रही है। इतना ही नहीं, रामाधीर सिंह की पत्नी इंदू देवी का आशीर्वाद लेने में भी कामयाब रही है।

कोयलांचल की खून से सनी मिट्टी
कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर, 1998 में ही विनोद सिंह की हत्या हुई। सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।
आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।
पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। उनकी हत्या 15 जुलाई, 1998 को की गई। कहते हैं सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।

15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।
कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे।

सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा, लेकिन सूर्य में वह तप नहीं
कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर। इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या करा दी गई।
चंद्रशेखर सूर्यदेव सिंह को बार बार कहे कि चन्द्रमा सिंह को उम्मीदवारी वापस लेने को कहो। सूर्यदेव सिंह के कहने पर भी चन्द्रमा सिंह ऐसा नहीं किये। बाद में जब सूर्यदेव सिंह चंद्रशेखर से बात करना चाहे तो चंद्रशेखर बात करने से मन कर दिए और यहीं अंत हो गया सूर्यदेव सिंह का सूर्य। उधर सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद बच्चा सिंह झरिया के विधायक बने और सिंह मैंशन के तर्ज पर ‘सूर्योदय’ बना लिया और राजन सिंह का परिवार ने रघुकुल। रामधीर सिंह का बलिया-धनबाद आना-जाना लगा रहा, लेकिन उनकी पत्नी इंदू देवी और बेटा शशि सिंह मेंशन में ही रहती रही । सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद ‘सूर्योदय’ और ‘सिंह मैंशन’ में कभी मधुर सम्बन्ध नहीं रहा, जहाँ तक नयी पीढ़ियों का सवाल है। नवम्बर 1990 में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे, तब वह सूर्यदेव सिंह से मिलने धनबाद आये थे। जून 15 सन 1991 में हार्ट अटैक से हुई उनकी मौत के बाद परिवार के बीच ही विवाद हो गया और सभी भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो गई। अब बच्चा सिंह नहीं हैं।
उन दिनों सूर्यदेव सिंह अपने उत्कर्ष पर थे। उत्तर प्रदेश के बलिया से आकर एक साधारण कोयला मजदूर के रूप में काम शुरू करने वाले सूर्यदेव सिंह ने कोयला मजदूरों की ट्रेड यूनियन की अगुवाई कर इतनी शोहरत हासिल की कि धनबाद की धरती पर पत्ता भी उनकी इक्षा के बिना नहीं हिलता था। जितने दबंग, उतने ही सामाजिक कार्यों में रुचि दिखाने वाले सूर्यदेव सिंह की लोकप्रियता का आलम रहा। चंद्रशेखर अब तक प्रधान मंत्री बने नहीं थे और जब प्रधानमंत्री बने तब भी सूर्यदेव सिंह को अपना परम-मित्र ही माना और कहा भी। चंद्रशेखर से नजदीकी के कारण उनका राजनीतिक रसूख परवान पर था। 1977 में सूर्यदेव सिंह पहली बार झरिया से विधायक बने।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार कोयलांचल में आठ बड़े गैंग में चार सौ करोड़ रुपए से भी अधिक की रंगदारी को लेकर खूनी खेल चलता रहता है। पिछले तीन दशकों में 350 से भी ज्यादा लोगों की हत्याएं माफियाओं ने कर दी, जबकि छोटे-छोटे प्यादे तो लगभग रोज ही मारे जाते हैं। कोयलांचल में 40 वैध खदाने हैं, जबकि इससे कहीं अधिक अवैध खनन। इन वैध खदानों से लगभग 1.50 लाख टन कोयले का उत्पादन होता है, जबकि इस उत्पादन में लोडिंग, अनलोडिंग और तस्करी में लगभग 400 करोड़ रुपए की रंगदारी माफिया के गुर्गे करते हैं। वैसे पिछले 50 साल से कोयलांचल में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, हर रोज एक छोटा गैंग उभरकर सामने आ जाता है। पर कोयलांचल में अभी भी ‘‘सिंह मेंशन’’ का ही दबदबा है, अब फर्क सिर्फ यह हो गया है कि सिंह मेंशन में भी बंटवारा हो गया और चारों भाईयों एवं उनके बेटों का अलग गैंग हो गया है।
कर्पूरी ठाकुर के साथ छत्तीस का आंकड़ा
वजह तो बहुत है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितौझिया के कर्पूरी ठाकुर का भारत रत्न होना। कर्पूरी ठाकुर पहली बार सन् 1970-1971 में दारोगा प्रसाद राय और भोला पासवान शास्त्री के बीच पांचवें विधानसभा के कालखंड में 162 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे। दूसरी बार का कालखंड था 1977-1979 और यह कालखंड था सातवें विधानसभा का। पहले एक वर्ष 301 दिनों के लिए कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने फिर आ गए रामसुंदर दास 302 दिनों के लिए।
यह एक ऐसा दौड़ था जब बिहार ही नहीं, देश में राजनीतिक परिस्थियाँ बदल रही थी, साथ ही, अपराधियों का राजनीतिकरण भी प्रारम्भ हो गया था। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि राजनीति का अपराधीकरण का श्रीगणेश हो गया था। तत्कालीन अविभाजित बिहार के अपराधी, जो सत्ता की गलियारों में कमर कसने लगे थे, उन्हें इस बात का एहसास हो गया था कि राजनीति उनके बिना नहीं चल सकती है और राजनेता उनके सहयोग के बिना, खासकर आर्थिक सहयोग, के बिना ‘राजनीति में डकार’ नहीं ले सकते हैं । यह सोच ‘पैसे’ के कारण हो गयी थी, जिसे तत्कालीन स्वार्थी राजनेताओं ने तुल भी दिया और भुनाया भी।
इसका सीधा प्रभाव उस दिन पटना सचिवालय में दिखा जब दक्षिण बिहार के ‘दर्जनों कोयला माफिया’ मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए एक साथ कमर कस कर तैयार हो गए थे। पटना की सड़कों पर, तीन-सितारा होटलों में (पांच सितारा होटल नहीं था), डाक बंगला में अपना-अपना ठिकाना बनाकर सरकार गिराने को सज्ज थे। वजह था कर्पूरी ठाकुर कोयला माफिया और उन माफियाओं के साथ हाथ मिलाने वाले सभी लोगों की ‘तथाकथित ताकत को चुनौती दिए थे।” यानी कर्पूरी ठाकुर और कोयला माफिआओं के साथ इस पार और उस पार की प्रशासनिक लड़ाई छिड़ गयी थी।
इतना ही नहीं, समयांतराल, वही कोयला माफिया एक बार फिर कोयला क्षेत्र के मजदूर संघ के नेता, जो प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने थे, बिंदेश्वरी दुबे के खिलाफ भी मोर्चा गोलबंद किया था। दुबे, जो 1985-1988 में दो साल 338 दिनों के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में थे और कोई साढ़े चार दशक तक कोयला क्षेत्र में मजदूरों का प्रतिनिधित्व किया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उन सभी गोलबंदी का प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नेतृत्व डॉ जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे।
डॉ. मिश्र 1975-1977 (दो साल 19 दिन), 1980-1983 (3 साल 67 दिन) और 1989-1990 (94 दिन) के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय में भी बैठे थे। इतना ही नहीं, उन दिनों डॉ. मिश्र की आवाज तत्कालीन अख़बारों में बहुत ही प्रमुखता के साथ प्रकाशित भी हुए थी जब उन्होंने कहा था कि ‘उनका उद्देश्य न केवल बिंदेश्वरी दुबे को मुख्यमंत्री कार्यालय से बाहर निकलना है, बल्कि कोयला क्षेत्र में उनके प्रभुत्व को भी नेश्तोनाबूद कर देना है।’ उन दिनों बिहार के कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव टी अन्जाइहा थे, जो बिहार के प्रभारी भी थे। दुबे ने कांग्रेस आलाकमान को पत्र लिखकर यह सूचित भी किया था कि प्रदेश में कुछ राजनीतिक नेता और कोयला माफिया एक साथ मिलकर हमारी सरकार को गिराने की कोशिश कर रहे हैं।
साढ़े चार दशक बात समय का चक्र फिर देखिये बिहार के समस्तीपुर जिला के पितौंझिया गाँव में गोकुल ठाकुर-श्री रामदुलारी देवी के घर में जन्म लिया ‘कपूरी’, जो बाद में कर्पूरी ठाकुर बने, देश की कुल 143 करोड़ लोगों का ‘रत्न’, यानी ‘भारत रत्न’ की उपाधि से अलंकृत हुए। साल 1977 का अप्रैल महीना का अंतिम दिन था और प्रदेश राष्ट्रपति शासन के अधीन चला गया था 30 अप्रैल से 24 जून 1977 तक, जब सातवीं विधान सभा में कर्पूरी ठाकुर 24 जून, 1977 को 11 वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिए थे। वे दो बार प्रदेश का नेतृत्व किये और कुल 829 दिन मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे।
कर्पूरी ठाकुर कोयला माफियाओं के खिलाफ लड़े, साथ नहीं। राजनीतिक गलियारे में उन्हें ‘जननायक’ कहा जाता है। कर्पूरी ठाकुर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को आरक्षण का लाभ प्रदान करने में अग्रणी थे क्योंकि उन्होंने 1977 से 1979 तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशों को लागू किया था। महान समाजवादी नेता को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया जाना हार्दिक प्रसन्नता का विषय है। केंद्र सरकार का ये अच्छा निर्णय है। लेकिन जिस दिन कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से अलंकृत किया गया, तत्कालीन अविभाजित बिहार और आज के बिहार और झारखंड में तत्कालीन कालखंड के कोई भी ‘राजनेता’ और ‘कोयला माफियाओं का नामोनिशान नहीं है। शायद इसे ही कालचक्र कहते हैं। आज स्थिति यह है कि जो बचे हैं वे सत्ता की लड़ाई अपने-अपने अस्तित्व को बचाने में लगे हैं।
एस के राय पर कातिलाना हमला
उस दिन सोमवार था फरवरी माह का पहली तारीख और 1988 साल। लुबी सर्कुलर रोड स्थित राष्ट्रीय कोलियरी मजदुर संघ का कार्यालय। समय सुबह का कोई 11 बजे। भवन के अंदर बैठक हो रही थी और माइक पर थे तत्कालीन कोयला क्षेत्र के नेता एस के राय। बाहर कई गाड़ियां आयी। कई लोग उतड़े और गोलियों की बारिश होने लगी। उद्देश्य एस के राय को मारना था। लेकिन समय उन्हें अपना कवच दे दिया। वे तो बच गए लेकिन उमाकांत सिंह के साथ-साथ चार लोग वहीँ ढ़ेर हो गए।
आज उस ज़माने के राष्ट्रीय कोलियरी मजदुर संघ के नेता एस के राय नहीं हैं। धनबाद के विधायक एस पी राय भी नहीं रहे। अभियंता सह श्रमिक नेता ए के राय भी अंतिम सांस ले चुके हैं। धनबाद के ‘सिंह’ नेताओं में सूर्यदेव सिंह नहीं है। नवरंगदेव सिंह भी नहीं हैं। सकलदेव सिंह भी मृत्यु को प्राप्त किये। बिनोद सिंह भी नहीं रहे। रघुनाथ सिंह भी नहीं रहे। बच्चा सिंह बीमार रह रहे हैं। यानी सत्तर के ज़माने से कोई ढ़ाई दशक तक धनबाद-कोयला क्षेत्र में का बादशाह, चाहे बन्दुक की गोलियों पर ही बना हो, राज करनेवाला, आमलोगों का लोगों का हाल-चाल पूछने वाला (व्यावसायिक मतभेद चाहे कितन भी हो) आज कोई नहीं हैं। आज उनकी अगली पीढ़ियों का भी नाम (कई एक का) इस पृथ्वी से उठा गया है। सब समय चक्र है।
बीपी सिन्हा और कोयला माफिया की शुरुआत
धनबाद की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी इस बात की गवाही आज भी देती है कि कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा @बीपी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में सिन्हा साहब का एकछत्र राज था। सिन्हा साहेब बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए।
उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। उनका इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी। लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी। घटनाओं की गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रहीं थी। ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चुका था उन दिनों यानी ए-आरा + बी-बलिया + सी-छपरा =डी धनबाद का नारा बुलंद हो चुका था।
कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाता है तब राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो जाता है, पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाये थे। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे।उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।

वे कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। किद्वान्ति है कि उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी।
उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। समय का चक्र यहाँ भी चल रहा था। केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोड़ने के लिए मौके की तलाश में थी।
उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1979 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं।
इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।
पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है।
