हीरापुर चौराहा (धनबाद) : आप माने या नहीं, आपकी मर्जी। भारत में औसतन जिलाधिकारियों / उपायुक्तों / पुलिस अधीक्षकों का एक स्थान पर कार्य करने का समय न्यूनतम आठ महीने से अधिकतम डेढ़ वर्ष का होता है। जबकि उसी जिले के पंचायतों, विधायकों और सांसदों का कार्यकाल पांच वर्ष निश्चित होता है, बशर्ते संस्था भंग नहीं हो जाय। यानी जो जनता द्वारा चयनित हैं उनका कार्यकाल निश्चित है, भले वे जनता के लिए अपने पूरे कार्यकाल में मूक-बधिर बने रहें। लेकिन जो उस जिले में सरकार की कल्याणकारी योजनाओं/नीतियों को लागू करने, जिले में कानून व्यवस्था बहाल रखने के लिए उत्तरदायी होता है, उसका कार्यकाल आठ महीने से डेढ़ साल के बीच लटकता रहता है। विश्वास नहीं होता तो सरकारी आंकड़ों पर शोध कर लें।
इस बीच अगर वह अधिकारी किसी सत्तारूढ़ या विपक्ष के नेताओं से, चाहे वह घुटना कद का ही क्यों न हो, छत्तीस का आंकड़ा बना लिया तो उस समय खंड के बीच में जाना भी तय होता है। वैसी स्थिति में सरकार की कल्याणकारी योजनाएं प्रारम्भ से अंत तक (यदि अमल में लाने की इच्छा हुआ तो) दर्जनों जिलाधिकारियों, उपायुक्तों, पुलिस अधीक्षकों के मेजों से गुजरता हैं। कल के दक्षिण बिहार का धनबाद जिला और आज का झारखण्ड राज्य का धनबाद जिला भी अछूता नहीं है इस ऐतिहासिक रवैये से। वैसी स्थिति में यहाँ भी जिलाधिकारी, उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक के लिए 'क्या नहाएंगे और क्या निचोड़ेंगे' लोकोक्ति अक्षरसः सत्य बैठता है। अगर ऐसा नहीं होता तो आज देश के जिलों का यह हाल नहीं होता।
कल के अविभाजित बिहार का दक्षिणी हिस्से का शहर और आज के झारखंड राज्य का एक महत्वपूर्ण शहर धनबाद 1928 से 1956 तक मानभूम जिले का हिस्सा था। हालांकि, 24 अक्टूबर 1956 को, राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर अधिसूचना 1911 के तहत धनबाद जिले को मानभूम जिले से अलग कर जिला मुख्यालय के रूप में गठन किया गया। एक स्वतंत्र जिला के रूप में अस्तित्व में आने के दो दिन बाद 26 अगस्त, 1956 को भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शरण सिंह जिला के उपायुक्त नियुक्त किये गए। धनबाद जिला के निर्माण के बाद विगत 69-वर्षों में जिला उपायुक्त कार्यालय अब तक 54 उपायुक्तों को देखा है। जिले के निर्माण (1956) से लेकर झारखंड के निर्माण वर्ष (नवम्बर 15, 2000) तक, अगर गणित से देखा जाय तो धनबाद 44 वर्षों में 31 उपायुक्त और झारखंड राज्य बनने के बाद विगत 25 वर्षों में 23 उपायुक्तों को देखा है।
समग्र रूप में अगर देखा जाय तो धनबाद के स्थापना काल से अब तक औसतन उपायुक्तों का सेवाकाल एक साल दो महीने का रहा है। जबकि, सन 1956 से बिहार से अलग कर झारखंड के निर्माण तक बिहार में 21 मुख़्यमंत्रिओं का चेहरा अवतरित और अस्त हुआ। इनमें श्रीकृष्ण सिन्हा, दीप नारायण सिंह, बिनोदानंद झा, कृष्ण बल्लभ सहाय, महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, भोला पासवान शास्त्री, हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय, कर्पूरी ठाकुर, केदार पांडेय, अब्दुल गफूर, जगन्नाथ मिश्र, राम सुन्दर दस, चंद्र शेखर सिंह, बिंदेश्वरी दूबे, भगवत झा आज़ाद, सत्येंद्र नारायण सिन्हा, लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी आदि हैं ।
इंडियन एक्सप्रेस, जुलाई 1998
राबड़ी देवी के बाद जैसे ही नितीश कुमार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने बिहार का विभाजन हुआ और 15 नवम्बर, 2000 को झारखण्ड राज्य अपने अस्तित्व में आया। साल 2000 के बाद एक ओर जहाँ बिहार में कुछ काल के लिए जीतन राम मांझी को छोड़कर नितीश कुमार मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान हैं।
जबकि झारखण्ड राज्य के निर्माण के बाद नए राज्य में सबसे पहले बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री बने और उसके बाद अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, मधु कोड़ा, हेमंत सोरेन, रघुबर दास और चम्पई सोरेन मुख्यमंत्री कार्यालय में विराजमान रहे। इस दृष्टि से विगत 25 वर्षों में एक तरफ जहाँ सात नेता झारखण्ड राज्य में मुख्यमंत्री बने औसतन तीन वर्ष पांच महीने के कार्यकाल साथ, धनबाद उपायुक्त कार्यालय में 25 वर्ष में 23 उपायुक्त आगे और गए। यानी औसतन कार्यकाल एक साल दो महीने का रहा।
अब सवाल यह है कि नंगा नहायेगा क्या और निचोड़ेगा क्या ? एक साल दो महीने के औसतन कार्यकाल में कोई उपायुक्त जिले का क्या विकास कर पायेगा?
स्थानीय घुटने कद के नेताओं से लेकर रांची के विधानसभा में बैठे नेताओं, मंत्रियों, मुख्यमंत्री के साथ साथ दिल्ली के शास्त्री भवन में बैठे कोयला मंत्रालय के मंत्रियों, अधिकारियों को खुश रखने सबंधी फाइलों पर हस्ताक्षर करेगा या फिर शहर में शांति व्यवस्था कायम रखने, अपराधियों को दबोचने, कोयला माफियाओं और सरगनों को पकड़ने का कार्य करेगा ? अगर इन वर्षों का इतिहास देखा जाए तो शायद प्रशासन के लोगों की नजर में सफेदपोश नेता अधिक महत्वपूर्ण रहा माफियाओं की तुलना में।
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विगत 69 वर्षों में, यानी धनबाद जिला के निर्माण के बाद अब तक बने सभी 54 उपायुक्तों के कार्यकाल में जिले में हुए कार्यों, खासकर कोयला माफिया के खिलाफ किये गए कार्यों को अगर आंका जाय यह यह गहन शोध का विषय होगा।
देश में जिस समय आपातकाल की घोषणा (25 जून 1975) हुयी थी, धनबाद के उपायुक्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कुंवर बहादुर सक्सेना (अगस्त 5, 1974 से जुलाई 24, 1975) थे। आपातकाल के दौरान ही सक्सेना को हटाकर भाप्रसे के अधिकारी लक्ष्मण शुक्ल उपायुक्त बने और इनके कार्यकार ( जुलाई 25, 1975 से अगस्त 21 1977) में ही आपातकाल समाप्त (मार्च 21, 1977) भी हुआ।
शुक्ला के जाने के बाद कोई डेढ़ वर्ष के लिए देवदास छोटराय उपायुक्त बने। लेकिन शहर को रक्तरंजित करने के लिए बन रहे चक्रव्यूह से भिज्ञ नहीं थे। धनबाद के साथ-साथ कोयलांचल में एक तरफ जहाँ कोयला खदानों, खासकर भूमिगत खदानों से अग्नि की ज्वाला सतह पर आना शुरू हो गया था; कोयलांचल पर आधिपत्य को तोड़ने के लिए बाहुबली का एक साम्राज्य तैयार हो रहा था। छोटराय के कार्यकाल में धनबाद की मिट्टी पर खून का जो खेल हुआ वह न केवल धनबाद के इतिहास में काला धब्बा लगाया, बल्कि कोयलांचल की भूमि में खूनी होली के शुरुआत का भी शंखनाद किया।

कहते हैं भूली रोड होते नया बाज़ार और वासेपुर की दूरी करीब ढाई किलोमीटर है जिसे अधिकाधिक 12 मिनट में तय किया जा सकता है। इसी तरह वासेपुर से कल के समाहरणालय के रास्ते सरायढेला की दूरी 13 किलोमीटर से अधिक नहीं है जिसे अधिकाधिक 25 से 30 मिनट में तय किया जा सकता है। लेकिन अगर धनबाद शहर की भौगोलिक स्थिति को देखें तो आज भी नयाबाजार, भूली रोड, वासेपुर और सरायढ़ेला अपने-अपने स्थान पर ही अवस्थित है और दूरियां भी उतनी ही है। लेकिन दुर्भाग्यवश जो समाहरणालय हीरापुर चौराहे से 25 कदम की दूरी पर था, आज शहर के मुख्य भाग से कोई दो किलोमीटर की दूरी पर चला गया। यानी अमन स्थापित करने वाले ही मुख्य शहर से किनारे हो गए। खैर।
धनबाद की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी इस बात की गवाही आज भी देती है कि कोयले की अवैध कमाई की पृष्ठभूमि 1950 में बिंदेश्वरी प्रसाद सिन्हा यानी बी पी सिन्हा ने डाली थी। उन दिनों सम्पूर्ण कोयलांचल में बीपी सिन्हा का एकछत्र राज था। सिन्हा बरौनी के रहने वाले थे और राजनीति में उनकी विशेष पकड़ थी। वे सर्वप्रथम सं 1950 में धनबाद पदार्पित हुए। उनमें बहुत बातें ईश्वरीय थी। लिखना, बोलना जैसा सरस्वती की देन थी। उनका वही आकर्षण तत्कालीन कोलियरी मालिकों को आकर्षित किया। वे इंटक से जुड़े और ताकतवर मजबूत नेता के रूप में उदित हुए।
उन्होंने कोयलांचल में युवा पहलवानों की फौज बनाई, जिसमें सूर्यदेव सिंह इनके सबसे विश्वासपात्र थे। उनका इतना दबदबा था कि उन्हीं की मर्जी से कोयला खदान चलती थी। सिन्हा का आवास व्हाईट हाउस के रूप में मशहूर हुआ करता था और पूरे इलाके में माफिया स्टाइल में उनकी तूती बोलती थी। लाठी हमारी तो मिल्कियत भी हमारी ” चरितार्थ हो रही थी। घटनाओं की गूंज बिहार और दिल्ली की सत्ता के गलियारों से लेकर पार्लियामेंट तक सुनाई पड़ रहीं थी। ए+बी+सी=डी काफी प्रचलित हो चुका था उन दिनों यानी ए-आरा + बी-बलिया + सी-छपरा =डी धनबाद का नारा बुलंद था।
कोल माइनिंग पर वर्चस्व के लिए मजदूर संघ का मजबूत होना बहुत ही आवश्यक था, बीपी सिन्हा इस बात को बखूबी जानते थे। जब 17 अक्टूबर 1971 को कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण हुआ। राष्ट्रीयकरण होते ही बीपी सिन्हा का कोल नगरी पर पकड़ और अधिक मजबूत हो गया। पूरे कोल माइनिंग में उनकी तूती बोलने लगती है, उनका अब कोयले की खदानों पर एकछत्र राज्य चलने लगता है। कहा जाता है कि मजदूरों को काबू में रखने के लिए उन्होंने पांच लठैतों की एक टीम बनाया। इसमें बलिया के रहने वाले सूर्यदेव सिंह और स्थानीय वासेपुर के शफी खान आदि शामिल थे। उसी समय से उनकी दुश्मनी वासेपुर के शफी खान गैंग्स से शुरू हुई। बीपी सिन्हा कांग्रेस के प्रचारक थे और कोल माइनिंग में भारतीय राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ की तूती बोलती थी। किद्वान्ति है कि उनका माफिया राज इतना बड़ा था की एक बार जब प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी अपने रैली के दौरान सभा में देर से आई थीं, इस बात को लेकर बीपी सिन्हा बहुत नाराज हुए थे, जिसको लेकर इंदिरा गाँधी को भरी सभा में जनता से क्षमा माँगनी पड़ी थी।
उनकी प्रभुता के किस्से में एक अध्याय यह भी जुड़ा है की उन्होंने अपने माली बिंदेश्वरी दुबे’ को मजदूर संघ का नेता तक बना डाला था। वे कांग्रेसी थे और उनका कद इतना बड़ा था की उन दिनों भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनकी वार्तालाप हॉटलाइन पर हुआ करती थी। समय का चक्र यहाँ भी चल रहा था। केंद्र की सत्ता से बेदखल हुई इंदिरा गांधी के विरोधी लहर के दौरान विरोधी बीपी सिन्हा के इस वर्चस्व को तोड़ने के लिए मौके की तलाश में थी।
उस दिन मार्च महीने का 28 तारीख था और साल 1978 था। धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में सिन्हा साहेब रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे। घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे। अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब 'हां' में मिलने पर वे लोग लौट गये। इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी और कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी। सिन्हा साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश किये। शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है 'डाकू' आये हैं। इतने में सिन्हा साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार करने लगा । करीब सौ गोलियां चली । सिन्हा साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती थी। सिन्हा साहेब खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़े थे। शरीर पार्थिव हो गया था। उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल रही होगी।
पूरे धनबाद ही नहीं, कोयलांचल से लेकर कलकत्ता तक, धनबाद से लेकर पटना के रास्ते दिल्ली तक कोहराम मच गया। सिन्हा साहेब की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी। बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखने वाले सिन्हा साहेब की हत्या में उनके करीबी कई लोगों का नाम आया। सिन्हा साहब का ‘अंत’, सूर्यदेव सिंह का ‘सूर्योदय’ था। सम्पूर्ण कोयलांचल सूर्यदेव सिंह की ऊँगली पर चलने लगी और भारत कोकिंग कोल मुख्यालय जाने के प्रवेश द्वार से कोई 100 कदम पर स्थित सिंह मैंशन इतिहास रचना प्रारम्भ कर दिया। व्हाइट हाउस का नामोनिशान समाप्त हो गया है। बीपी सिन्हा साहेब की हत्या में सूर्यदेव सिंह का नाम आया था, लेकिन कुछ समय बाद वे इस काण्ड से बरी हो गए।

कोयलांचल की काली, लेकिन रक्तरंजित मिट्टी आज भी पिछले छह दशकों का खुनी इतिहास याद रखे है। धनबाद-झरिया कोयलांचल के बारे में जब भी कोई अख़बार वाला, शोधकर्ता, पत्रकार, लेखक, विश्लेषक धनबाद की खुनी होली के बारे में जानना चाहता है तो वह धनबाद समाहरणालय के वातनुकूलत कक्ष में बैठे अधिकारियों के पास नहीं पहुंचकर, कतरास मोड़ की काली मिट्टी पर पालथी मारकर बैठते हैं। चाय की चुस्की के साथ वहां की मिटटी एक-एक घटना को प्रत्यक्षदर्शी होने का गवाही देती है। उस ज़माने में इतने मंहगे हथियार भी उपलब्ध नहीं थे। उधर विदेशी मौद्रिक बाजार में भारतीय रुपये का मोल बढ़ रहा था, स्थित होता था, इधर कोयलांचल में कोयले की नजर लगे लोगों की जिंदगी सस्ती होती जा रही थी – ठांये ठांये ठांये।
झरिया विधान सभा की मिट्टी आज भी कहती है कि सन 1967 में रामदेव सिंह, फिर 1967 में ही चमारी पासी, 1977 में श्रीराम सिंह की हत्या हुई। सं 1978 में बीपी सिन्हा को गोली मारी गयी। पांच साल बाद सन 1983 में शफी खान, फिर 1984 में मो असगर, 1985 में लालबाबू सिंह, 1986 में मिथिलेश सिंह, 1987 में जयंत सरकार की हत्या हुई। हत्या का सिलसिला अभी रुका नहीं था। इसके बाद 1986 में अंजार, 1986 में शमीम खान, 1988 में उमाकांत सिंह, 1989 में मो सुल्तान की हत्या हुई। उसी वर्ष 1989 में ही राजू यादव, सं 1994 में मणींद्र मंडल, 1998 मो नजीर को मौत के घाट उतारा गया। 15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी।
उस दिन सोमवार था फरवरी माह का पहली तारीख और 1988 साल। लुबी सर्कुलर रोड स्थित राष्ट्रीय कोलियरी मजदुर संघ का कार्यालय। समय सुबह का कोई 11 बजे। भवन के अंदर बैठक हो रही थी और माइक पर थे तत्कालीन कोयला क्षेत्र के नेता एस के राय। बाहर कई गाड़ियां आयी। कई लोग उतड़े और गोलियों की बारिश होने लगी। उद्देश्य एस के राय को मारना था। लेकिन समय उन्हें अपना कवच दे दिया। वे तो बच गए लेकिन उमाकांत सिंह के साथ-साथ चार लोग वहीँ ढ़ेर हो गए।

आज उस ज़माने के राष्ट्रीय कोलियरी मजदुर संघ के नेता एस के राय नहीं हैं। धनबाद के विधायक एस पी राय भी नहीं रहे। अभियंता सह श्रमिक नेता ए के राय भी अंतिम सांस ले चुके हैं। धनबाद के ‘सिंह’ नेताओं में सूर्यदेव सिंह नहीं है। नवरंगदेव सिंह भी नहीं हैं। सकलदेव सिंह भी मृत्यु को प्राप्त किये। बिनोद सिंह भी नहीं रहे। रघुनाथ सिंह भी नहीं रहे। बच्चा सिंह भी नहीं रहे हैं। यानी सत्तर के ज़माने से कोई ढ़ाई दशक तक धनबाद-कोयला क्षेत्र में का बादशाह, चाहे बन्दुक की गोलियों पर ही बना हो, राज करनेवाला, आमलोगों का लोगों का हाल-चाल पूछने वाला (व्यावसायिक मतभेद चाहे कितन भी हो) आज कोई नहीं हैं। आज उनकी अगली पीढ़ियों का भी नाम (कई एक का) इस पृथ्वी से उठा गया है। सब समय चक्र है।
कोयलांचल में खून की होली के लिए ‘होली पर्व’ का होना आवश्यक नहीं है। यहाँ वर्चस्व स्थापित करने के लिए, वर्चस्व बनाये रखने के लिए कभी भी, कहीं भी खून की होली हो जाती है। 15 जुलाई, 1998 को कतरास हटिया शहीद भगत सिंह चौक के पास ताबड़तोड़ गोलियों से हमला कर विनोद सिंह और उनके चालक मन्नु अंसारी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उस समय सुबह का कोई 8.40 बजा था। विनोद सिंह कोल डंप जाने के लिए अपनी नई एम्बेसडर कार से निकले थे। उस कार को मन्नु अंसारी चला रहा था। पंचगढी बाजार में गाडियां जाम में थोडी देर फंसी रही। सुबह-सवेरे जैसे ही कतरास हटिया भगत सिंह चौक के पास जैसे ही पहुंचे, एक सादे रंग की मारुति कार दोनों गाडियों को ओवरटेक कर आगे रुकी, मारुति से तीन लोग उतरे और विनोद सिंह की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। विनोद सिंह और मन्नु खून से लथपथ गिरे हुए थे। कहते हैं उस हमलावरों में रामधीर सिंह और राजीव रंजन सिंह शामिल थे। रामधीर सिंह झरिया के पूर्व विधायक स्वर्गीय सूर्यदेव सिंह के पांच भाइयों में सबसे छोटे है। रामधीर सिंह को ‘सिंह मेन्शन’ के रणनीतिकार के रूप में देखा जाता रहा है।

25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले ही थे। हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई। सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी। जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी। दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी और अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया।
सन 2000 में रवि भगत, 2001 जफर अली और नजमा व शमा परबीन, 2002 गुरुदास चटर्जी की हत्या हुई। उसी वर्ष 2002 में ही सुशांतो सेनगुप्ता की हत्या हुई। सन 2003 प्रमोद सिंह, फिर 2003 में राजीव रंजन सिंह, 2006 में गजेंद्र सिंह, 2009 में वाहिद आलम, 2011 में इरफान खान, सुरेश सिंह, 2012 में इरशाद आलम उर्फ सोनू और 2014 में टुन्ना खान तथा 2017 में रंजय सिंह की हत्या हुई।
आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी। इतना ही नहीं, अनेकों बार एस के राय जो इंटक के नेता भी थे, पर हमला हुआ। कोयलांचल की इसी खुनी होली और कोयले से कमाई के कारण ही बिनोद बिहारी महतो, शिबू सोरेन आदि नेता भी बने। इसी कमाई के कारण अविभाजित बिहार और बाद में झारखण्ड के साथ-साथ देश के सभी राज्यों के नेताओं की नजर, केंद्र में बैठे मंत्रियों की पैनी नजर इस काले सोने की ओर लगी होती है। काला होने के बाद भी सभी इसे प्यार करते हैं।

पिछले दिनों सूर्यदेव सिंह के भाई को बाहुबली रामधीर सिंह को धनबाद की एक अदालत ने विनोद सिंह हत्याकांड के मामले में कोई रियायत नहीं दी। रामधीर सिंह बाहुबली सकलदेव सिंह और उनके भाई बिनोद सिंह की हत्या का अपराधी थे। वैसे 25 जनवरी 1999 को भूली मोड़ के पास सकलदेव सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस मुकदमें में धनबाद के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रिजवान अहमद की अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए उनकी रिहाई का फैसला सुनाया था, लेकिन आज वे बिनोद सिंह हत्या कांड के अपराध में कारावास में ही रहे। उन्हें उम्र कैद की सजा है। विनोद सिंह बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह के भाई थे। सकलदेव सिंह – विनोद सिंह के पिता मुखराम सिंह अविभाजित बिहार के छपरा ज़िले के उरहर पुर गांव से धनबाद के सिजुआ आये थे रोजी-रोटी की तलाश में।
कहते हैं वे सूर्य देव सिंह के द्वारा स्थापित जनता मजदूर संघ के वह अध्यक्ष भी रह चुके है। लेकिन सजायाफ्ता होने के बाद उन्हें इस पद से हटा दिया गया। विनोद सिंह हत्याकांड में लोअर कोर्ट ने 2015 में रामधीर सिंह को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। डेढ़ साल से अधिक समय तक फरार रहने के बाद उन्होंने धनबाद कोर्ट में सरेंडर किया था। विधि का विधान देखिये उनकी पत्नी इंदू देवी धनबाद नगर निगम की मेयर रह चुकी हैं। विनोद सिंह हत्याकांड में विगत 25 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट की डिवीजन-बेंच ने रामधीर सिंह की अपील पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। इतना ही नहीं, रामधीर सिंह के बेटे शशि सिंह पर कोयला कारोबारी व कांग्रेस नेता सुरेश सिंह की हत्या का भी आरोप है। सुरेश सिंह की हत्या 7 दिसंबर 2011 को हुई थी। इस हत्या के बाद शशि सिंह धनबाद से फरार हो गए। धनबाद पुलिस अभी भी शशि सिंह को ढूंढ रही है। सुरेश सिंह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से चुनाव भी लड़ चुके थे।
सिंह मेंशन हमेशा सुर्खियों में रहा और कोयला कारोबार से लेकर राजनीति तक इस परिवार का दबदबा रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार सियासत में मजबूत दखल का प्रमाण यह है कि धनबाद नगर निगम की कुर्सी इन्हीं परिवारों के बीच रही। धीरे-धीरे नीरज सिंह भी राजनीति में तेजी से उभरने लगे। पिछले विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर झरिया से खड़े हुए थे, जबकि उसके चचेरे भाई संजीव सिंह भाजपा के टिकट पर। इस चुनाब के बाद परिवार के बीच विवाद और खुलकर सामने आ गया। नीरज सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़े होने वाले थे, लेकिन नीरज सिंह की हत्या हो गयी।
21 मार्च 2017 की शाम को नीरज सिंह अपनी फार्च्यूनर जेएच10एआर-4500 से रघुकुल स्थित आवास लौट रहे थे। सरायढेला के स्टील गेट के पास बने 15 स्पीड ब्रेकर के कारण गाड़ी धीमी हुई और तभी घात लगाए बाइक सवार हमलावरों ने गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया। एके 47, कारबाइन और 9 एमएम पिस्टल से हुई अंधाधुंध फायरिंग में 50 से अधिक गोलियां चली। पोस्टमार्टम में नीरज सिंह के शरीर से 17 गोलियां बरामद हुईं। उनके साथ मौजूद ड्राइवर ललटू महतो, साथी अशोक यादव और बॉडीगार्ड मुन्ना तिवारी की मौके पर मौत हो गई। नीरज सिंह, यूपी के बलिया के पूर्व विधायक विक्रमा सिंह के भतीजे थे। उनके चचेरा भाई संजीव सिंह उस समय झरिया से बीजेपी विधायक थे। राजनीतिक व कारोबारी रसूख के कारण इस हत्याकांड के पीछे बड़े पैमाने पर साजिश की आशंका जताई गई थी।

यानी 27 अगस्त, 2025 को धनबाद न्यायालय के एक विशेष न्यायाधीश दुर्गेश चंद्र अवस्थी ने आठ साल पुराने बहुचर्चित नीरज सिंह हत्याकांड के मामले में फैसला सुनाते हुए संजीव सिंह और सह-आरोपियों जयेंद्र सिंह उर्फ पिंटू सिंह, डबलू मिश्रा, विनोद सिंह, सागर सिंह उर्फ शिबू, चंदन सिंह, कुर्बान अली, पंकज सिंह और रणधीर धनंजय उर्फ धनजी को बरी कर दिया।
आठ साल बाद जब अदालत ने कई आरोपियों को बरी कर दिए, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर नीरज सिंह की हत्या किसने की? पुलिस की जांच पर भी अब सवाल उठने लगे हैं। दो बार के भाजपा झरिया विधायक (2009 और 2014) संजीव सिंह को 12 अप्रैल, 2017 को हत्या के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने अपने चचेरे भाई और ट्रेड यूनियन प्रतिद्वंद्वी की हत्या की साजिश रचने के आरोप में अपने तीन सहयोगियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था। बहरहाल, झरिया की पूर्व विधायिका और दिवंगत नीरज सिंह की पत्नी श्रीमती पूर्णिमा सिंह, उनके छोटे भाई अभिषेक सिंह, झरिया के वर्तमान विधायिका श्रीमती रागिनी सिंह, सिंह मेंशन के कोई भी सदस्य फोन का जवाब नहीं दिए।जबकि निचली अदालत द्वारा जारी आदेश पर अनेकानेक प्रश्न उठ रहे हैं।
क्रमशः …….
