नई दिल्ली: 11 अगस्त: कल की ही तो बात है काकोरी की घटना का 100 वर्ष पूरा हुआ। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने काकोरी कांड की 100वीं वर्षगांठ पर इसमें भाग लेने वाले भारतीयों की वीरता और देशभक्ति के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सौ साल पहले काकोरी में देशभक्त भारतीयों द्वारा दिखाए गए उस साहस ने औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लोगों के गहरे आक्रोश को उजागर किया। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से लोगों के पैसों का उपयोग औपनिवेशिक शोषण को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा था, उससे वे क्रोधित थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी वीरता को हमेशा भारत के लोगों द्वारा याद किया जाएगा। उन्होंने एक मजबूत और समृद्ध भारत के उनके सपनों को पूरा करने की दिशा में काम करना जारी रखने की सरकार की प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
काकोरी आज उत्तर रेलवे क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण स्टेशन है। यह मोरादाबाद मंडल में आता है। 4 फरवरी 1922 को अंग्रेजों के शासन से नाराज लोगों ने गोरखपुर के चौरी चौरा थाने में आग लगा दी थी। इस अग्निकांड में 23 पुलिसवालों की जलकर मौत हो गई थी। इससे नाराज होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था, जिसने हजारों क्रांतिकारियों को झटका दिया। गांधी जी के इस फैसले से नाराज कुछ युवकों ने एक पार्टी का गठन किया । जिसमें भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे युवा क्रांतिकारी शामिल हुए।
इन युवाओं का मानना था कि भारत की आजादी के लिए हथियार उठाने पड़ेंगे। हथियार खरीदने के लिए पैसों की जरूरत थी । इसलिए युवा क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के सरकारी खजाने को लूटने का निर्णय किया । जिसके बाद 9 अगस्त 1925 को सहारनपुर से लखनऊ की ओर जा रही ट्रेन को निशाना बनाया गया । इस ट्रेन को का को री स्टेशन पर रोका गया और लूटा गया । क्रांतिकारियों के हाथ केवल 4,600 रुपए की रकम आई। इस घटना से ब्रिटिश सरकार में हड़कंप मच गया ।
ब्रिटिश शासन ने करीब 40 लोगों को गिरफ्तार किया। 8 सितंबर 1926 को दिल्ली से अशफाकउल्ला खान को गिरफ्तार किया गया। इस पूरे केस की 9 मार्च 1927 तक सुनवाई लखनऊ के स्पेशल मजिस्ट्रेट के सामने हुई थी। इसके बाद 6 अप्रैल को 1927 को ब्रिटिश कोर्ट के जज लुईस स्टुअर्ट और मोहम्मद रजा खान बहादुर ने राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई थी। इसके अलावा कई लोगों को 14 साल तक की सजा दी थी। पुलिस काकोरी कांड के आरोप में चंद्रशेखर आजाद को गिरफ्तार नहीं कर पाई और बाद में वे इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हो गए।
लेकिन, एक सवाल उठता है कि भारत के 145.09 करोड़ आवाम, युवापीढ़ी के साथ-साथ राजनीतिक गलियारे में कुर्सी पर आसीन राजनेतागण काकोरी कांड के रचयिता और उनके परिवार, परिजनों को जानते हैं? शायद नहीं। सचिन्द्र नाथ सान्याल, जिन्होंने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक थे, उनके परिवार या वंशजों को पहचानते हैं? शायद नहीं। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। यह अलग बात है कि सामाजिक क्षेत्र के मीडिया घरानों और प्लेटफॉर्मों को आने के बाद उन प्लेटफॉर्मों पर 'नमन' और 'श्रद्धांजलि' जी बाढ़ आ जाती है। यह भी पीड़ा दायक है।
कुछ दिन पूर्व सचिन्द्र नाथ सान्याल के पुत्र श्री जयंत कुमार सान्याल ने कहा था: "काकोरी घटना का रचयिता मेरे पिता जी थे। वह घटना तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की नींव हिला दी थी। क्रांतिकारियों के बीच आपसी तालमेल, भारत माँ की आज़ादी के प्रति उनका अटूट विश्वास, अदम्य साहस का प्रतिक था। उस काण्ड में काफी लोगों को सजा हुई, फांसी पर लटकाये गए, जेल में बंद किये गए। देश आज़ाद हुआ। लेकिन अगर आज़ाद देश के नागरिक या राजनेता अपने कलेजे पर हाथ रखकर स्वयं से पूछें कि क्या काकोरी काण्ड के क्रांतिकारियों, शहीदों के परिवार और परिजनों को वह सम्मान मिला तो इसका उत्तर उनके पास भी नहीं होगा। आज देश में क्रांतिकारियों, शहीदों का, उनके शहादत का राजनीतिक बाजार में खरीद-बिक्री होता है। उन्हें वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वे हकदार थे। और इसके लिए केवल शासन या व्यवस्था को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता, स्वतंत्र भारत के लोग भी उतने ही दोषी हैं।" खैर।
कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने "हर घर तिरंगा" अभियान में लोगों की व्यापक भागीदारी पर प्रसन्नता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह देशभक्ति की उस गहरी भावना का प्रतीक है जो भारत के लोगों को एकजुट करती है और तिरंगे के प्रति उनके अटूट गौरव को दर्शाती है। उन्होंने नागरिकों से अपील की है कि वे अपनी तस्वीरें और सेल्फी harghartiranga.com पर साझा करते रहें।

तिरंगा के प्रति प्रधानमंत्री का सम्मान और राष्ट्र के लोगों को जागरूक करने का वचनबद्धता सामाजिक क्षेत्र के मीडिया पृष्ठों पर देखकर, पढ़कर बहुत प्रसन्नता हुई। लेकिन एक सवाल मन को व्यथित भी किया - क्या महज तिरंगा लहराने, फहराने मात्र से तिरंगा के प्रति या तिरंगा का लाज रखने वाले क्रांतिकारियों, मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीदों और उनके वंशजों के प्रति हमारा सम्मान दृढ़ रहेगा? क्या हम उन्हें और उनके परिवार, परिजनों को कभी जानने की कोशिश किये हैं जिन्होंने मातृभूमि की आज़ादी और तिरंगा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दिए? शायद नहीं।
आज़ादी का अमृत महोत्सव के तत्वावधान में शुरू हुआ 'हर घर तिरंगा' अभियान लोगों को तिरंगा घर लाने और भारत की आज़ादी के उपलक्ष्य में उसे फहराने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किया गया था। यह इस विचार से उपजा है कि राष्ट्रीय ध्वज के साथ हमारा रिश्ता हमेशा व्यक्तिगत से ज़्यादा औपचारिक और संस्थागत रहा है। इस प्रकार, एक राष्ट्र के रूप में सामूहिक रूप से ध्वज को घर लाना न केवल तिरंगे के साथ व्यक्तिगत जुड़ाव का प्रतीक बन गया, बल्कि राष्ट्र निर्माण के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का भी प्रतीक बन गया।
तीन वर्ष पूर्व, यानी 2022 में शुरू हुए इस अभियान के तहत भारत की 145.9 करोड़ की आवादी में 2022 में मात्र 23 करोड़ घरों पर ही तिरंगा लहराया गया और सरकार के आदेशानुसार मात्र 6 करोड़ लोगों ने ध्वज के साथ अपनी 'सेल्फी' हरघरतिरंगा(डॉट)कॉम पर अपलोड लिए। अगले वर्ष 2023 में सेल्फी की संख्या 6 से बढ़कर 10 करोड़ हुई।
खादी इण्डिया अथवा अन्य संस्थाओं द्वारा बिकने वाले तिरंगा के मूल्यों को अगर देखें और औसतन 100/- रुपये ही मानकर चलें, तो 2022 में 23 करोड़ x 100 = 2300 करोड़ का व्यवसाय रहा है तिरंगा। अगर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय सचिव गोविंद मोहन की बात लें तो 2023 में भारतीय डाक विभाग ने 2.5 करोड़ ध्वजों की मांग की थी । अगर उसी कीमत को आधार माने तो 2.5 करोड़ x 100/- का व्यवसाय डाक विभाग द्वारा हुआ। निजी क्षेत्रों के उद्यमियों, व्यापारियों और व्यवसायिओं द्वारा उत्पादित और भारत के बाज़ारों में बिकने वाले राष्ट्र ध्वजों की बात अलग है। साल 2024 और 2025 के आंकड़े भी कुछ ऐसे ही होंगे। उस वर्ष इंटरनेट के माध्यम से सेल्फी अपलोड करने में डाटा-मूल्य की बात छोड़ दें।
पिछले वर्ष 9 अगस्त को मीडिया से बात करते केवीआईसी के अध्यक्ष मनोज कुमार ने कहा था कि आजादी के अमृत काल में केवीआईसी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की विरासत खादी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रांड शक्ति से नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। प्रधानमंत्री के 'हर घर तिरंगा अभियान' को भारत के हर घर तक पहुंचाने के लिए केवीआईसी ने पूरे देश में 'हर घर तिरंगा, हर घर खादी' अभियान शुरू किया। इस अभियान के तहत, खादी/पॉलिएस्टर से बने 3X2 फीट के राष्ट्रीय ध्वज देश भर के खादी स्टोर पर मात्र 198 रुपये की विशेष कीमत पर उपलब्ध हैं। अधिक आकार-प्रकार के तिरंगा की कीमत अलग निर्धारित किया गया। इंटरनेट पर विभिन्न दुकानों में उपलब्ध तिरंगा तस्वीर में देखा जा सकता है। वैसे समाचारों में, गली-मोहल्लों में, सड़कों पर, कार्यालयों में लोग कहते नहीं थकते हैं कि पिछले तीन वर्षों में, 'हर घर तिरंगा' एक जन आंदोलन बन गया है। देश भर में, समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों ने इस विचार को अपनाया है।
लेकिन उन्हें कैसे कहा जाय कि विगत 50 वर्षों में, यानी सन 1974 के बाद भारत में कोई जन आंदोलन हुआ ही नहीं है, लोग जन आंदोलन का गवाह बने ही नहीं है। साल 1974 में जयप्रकाश नारायण राजनीति से प्रेरित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए देश के युवाओं की अगुवाई में सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था। गली, कूची, घरों से निकलकर लोग सड़कों पर आये थे जो जन आंदोलन का रूप लिया था।
पचास वर्षों के बाद आज आंदोलन सड़कों पर नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर होती है। आज स्थिति यह है कि सैकड़े 70 से अधिक फीसदी लोग तिरंगा का प्रथम प्रारूप किसने बनाया या भारत में आज जिस तिरंगा को हम अपनाये हैं, उसका अंतिम प्रारूप किसने बनाया; नहीं जानते हैं। जबकि कहा जाता है कि हर घर तिरंगा - घर-घर तिरंगा पहल के पीछे का उद्देश्य लोगों के दिलों में देशभक्ति की भावना जगाना और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बारे में जागरूकता बढ़ाना था।
काश !! तिरंगा के प्रति, जंगे आज़ादी के दौरान मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए, तिरंगा के सम्मान के लिए अपने-अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों, शहीदों और उनके परिवारों को भी स्वतंत्र भारत के लोग जानते। आज सोशल मिडिया पर अथवा राजनीतिक मंचों पर भले उन क्रांतिकारियों को 'नमन' और 'श्रद्धांजलि' उनके जन्मदिन और शहादत दिवस पर दिया जाता हो, उनके परिवार और परिजन गुमनामी जीवन जी रहे हैं - यह भी सच है।
अगर ऐसा नहीं होता 1857 के विद्रोह के नायकों में से एक तात्या टोपे के वंशज बिठूर, कानपुर में संघर्ष नहीं कर रहे होते। उनके वंशज पूजा-पाठ कर जीवन यापन नहीं कर रहे होते। शहीद उधम सिंह के मातृपक्ष के वंशज कई सरकारी दस्तावेजों को, नेताओं के आश्वासनों को हाथ में लिए देहाड़ी पर कार्य कर जीवन यापन नहीं करते होते। शहीद सत्येन्द्र नाथ मुखर्जी और शहीद खुदीराम बोस के प्रतिमा पर उनके गाँव के ही लोग स्नान करने के उपरांत अपने आंतरिक वस्त्रों को सूखने के लिए नहीं फैलते। दुखद है।

आगामी 15 अगस्त को भारत के लोग जश्ने आज़ादी का 78वां सालगिरह मानाने जा रहे हैं और उधर स्वतंत्रता आंदोलन के भुला दिए गए नायकों के वंशज दयनीय स्थिति में रह रहे हैं।
हमारे शहीदों के कुछ वंशज मामूली मजदूरी पर छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं, जबकि कई आधुनिक नेताओं के आश्वासन और इस्तेमाल का शिकार हो रहे हैं। शहीद उधम सिंह के परपोते जीत सिंह को पंजाब के संगरूर जिले में एक निर्माण स्थल कार्य कर रहे थे। जीत सिंह दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते रहे हैं। उधम सिंह 1940 में लंदन गए और जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर की हत्या कर दी। शहीद का परिवार अत्यधिक गरीबी का सामना कर रहा है। हालाँकि, जीत सिंह से लेकर उनके परिवार के सभी सदस्य, महिला, पुरुष विगत कई वर्षों से स्थानीय प्रशासन से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक निहोरा-विनती हेतु जूते - चप्पल रगड़े, परिणाम शून्य निकला।
भारत अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और मान्यताओं का देश है। लेकिन इन विविधताओं के परे एक साझा विरासत छिपी है, प्रतिरोध, बलिदान और मुक्ति की। पीढ़ियाँ उन वीर स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियाँ सुनकर बड़ी हुई हैं जिन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी ताकि हम आजादी से जी सकें। फिर भी, कहीं न कहीं, वे बलिदान आधुनिकता की पृष्ठभूमि में फीके पड़ गए हैं। जब "स्वतंत्रता सेनानी" शब्द का उच्चारण होता है, तो हमारी सामूहिक स्मृति से कुछ ही नाम उभर कर आते हैं। बाकी धूल से सनी किताबों और भूले-बिसरे वंशवृक्षों के नीचे दबे रह जाते हैं।
विगत दिनों जीत सिंह का परिवार दिल्ली भी आया था। दिल्ली विधानसभा परिसर में जंगे आज़ादी के क्रांतिकारियों की तस्वीरों को तत्कालीन मंत्रियों के कार्यालय के बाहर फ्रेम में टंगा देख, दुखी भी हुआ। उनका कहना था कि जिन लोगों की शहादत के कारण देश आज़ाद हुआ, आज नेताओं ने उसे अपने-अपने कार्यालयों के प्रवेश द्वार पर इस कदर लटकाये हैं जैसे व सभी द्वारपाल हों। यही सम्मान मिला उन वीर क्रांतिकारियों को। आज भारत की अधिकांश जनसंख्या स्वतंत्रता के बाद की है। केवल लगभग 12 प्रतिशत लोग 78 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं, जो दावा कर सकते हैं कि उन्होंने औपनिवेशिक और स्वतंत्र भारत, दोनों को देखा है। बाकी लोगों के पास सिर्फ़ कहानियाँ हैं, और अक्सर, उन्हें भी सोशल मीडिया के चश्मे से राजनीतिकरण या कमज़ोर कर दिया जाता है। यादों की जगह लाइक और रीट्वीट ने ले ली है। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की विरासत हैशटैग और खोखली श्रद्धांजलि तक सीमित हो गई है। उनके असली वंशज गुमनामी में और अक्सर गरीबी में जी रहे हैं।
उदाहरण के लिए, बटुकेश्वर दत्त को ही लीजिए। एक क्रांतिकारी जिन्होंने भगत सिंह के साथ मिलकर एक सोए हुए राष्ट्र को जगाने के लिए केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके थे। जहाँ सिंह अमर हो गए, वहीं दत्त अँधेरे में खो गए। उन्हें एक अलग जेल में स्थानांतरित कर दिया गया और अपने साथियों से उनका संपर्क टूट गया। एक बार भगत सिंह ने दत्त की बहन को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने अपने लापता दोस्त के बारे में अपनी पीड़ा व्यक्त की थी और उनसे लाहौर न आने का आग्रह किया था क्योंकि यह व्यर्थ होगा।

दत्त जीवित रहे और आजादी देखने के लिए जीवित रहे। लेकिन 1965 में उनकी मृत्यु हो गई, गुमनाम और ज्यादातर लोगों की नज़रों से ओझल। उनकी बेटी भारती बागची कहती हैं: "मेरे पिता को अपने देश पर गर्व था। भगत सिंह की माँ कहा करती थीं, 'हालांकि मैंने एक बेटा खो दिया, लेकिन बट्टू ज़िंदा रहेगा और दिखाएगा कि क्रांतिकारी भी कुछ नया कर सकते हैं।'" बागची, जो अब पटना में प्रोफ़ेसर थीं, इस बात पर अफ़सोस जताती थीं कि स्कूलों में इन नायकों के बारे में कितना कम पढ़ाया जाता है और उनकी कितनी कहानियाँ अनकही रह जाती हैं।
इसी तरह, 1857 के विद्रोह के नायकों में से एक, तात्या टोपे के वंशज कानपुर के बिठूर में संघर्ष कर रहे हैं। विनायक राव टोपे, जो आज भी शहीद तात्या टोपे के कर्मस्थली बिठूर में अपनी वृद्ध पत्नी श्रीमती सरस्वती टोपे के साथ रहते हैं, कहते हैं: "इस दरवाजे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से लेकर देश और प्रदेश के दर्जनों नेता, मंत्री, अधिकारी आये; सभी घड़ियाली आंसू बहाये, शहीदों और उनके परिवारों का यथोचित सम्मान होना चाहिए, कहे; लेकिन अखबार में छपने के अलावे कुछ भी ऐसा नहीं हुआ, जिसके वे हकदार थे। मैं मुद्दत तक गंगा के किनारे अपने घर के बाहर एक किराने की दूकान चलाकर, मोहल्ले में पूजा-पाठकर परिवार चलते आ रहा हूँ। लेकिन कौन पूछता है। स्वतंत्रता दिवस पर लोग आएंगे, यहाँ की मिट्टी को नमन करेंगे, तस्वीर खिंचवाएंगे, सेल्फी लेंगे, और फिर शहीदों के प्रति उनका सम्मान वहीं समाप्त हो जाएगा। यथार्थ यही है।"
पश्चिम बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर में शहीद सत्येन्द्र नाथ बोस, उनके शिष्य शहीद खुदीराम बोस के घर-परिवारों की स्थिति भी बेहतर नहीं नहीं। पंद्रह फुट की सड़क के बीचोबीच गोलाकार क्षेत्र में दोनों की प्रतिमा तो लगी है, लेकिन उस प्रतिमा पर स्थानीय लोग अपने वस्त्रों को सुखाते हैं। प्रतिमा के बाएं हाथ जाने वाली गली, जहाँ जंगे आज़ादी के कालखंड में क्रांतिकारियों की बैठक हुआ करती थी, योजनाएं बनती थी, आज उस घर के दीवार भी अलग-थलग हो रहे हैं। घरों के दीवारों पर पेड़ निकल गए हैं। आज भी शहीद सत्येंद्रनाथ बोसु की परपोती अनीता बोस बिलख रही हैं कि समाज में सत्येन्द्रनाथ बोस या खुदीराम बोस को जो सम्मान मिलना चाहिए थे, वह नहीं मिला। सत्येंद्र नाथ बोस और खुदीराम बोस अलीपुर बम कांड में शामिल थे। दोनों को 1908 में फांसी दे दी गई। सत्येंद्रनाथ 26 साल के थे, जबकि खुदीराम सिर्फ़ 18 साल के थे जब उन्हें अंग्रेजों ने फांसी दी थी।
शहीद मंगल पांडे के प्रपौत्र श्री रघुनाथ पांडेय, झाँसी की रानी, जसपाल सिंह (बाबू कुंवर सिंह कमांडर-इन-चीफ), वाजिद अली शाह, जबरदस्त खान, तात्या टोपे, बहादुर शाह जफर, दुर्गा सिंह, सुरेंद्र साई, उधम सिंह, अशफाकुल्ला खान, खुदीराम बोस, भगत सिंह, सत्येन्द्र नाथ बोस, चन्द्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, जतीन्द्रनाथ मुखर्जी या बाघा जतिन, कुशल कोंवर, सचिन्द्र नाथ सान्याल जैसे कई शहीदों और उनके वंशजों को कौन जानता है आज? ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले और मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले विस्मृत क्रांतिकारियों और शहीदों को श्रद्धांजलि देने का उद्देश्य उद्धरण पोस्ट करना, तस्वीरों पर माल्यार्पण करना या शहीदों पर बायोपिक बनाना नहीं है।
शहीद मंगल पांडे के प्रपौत्र श्री रघुनाथ पांडे जो पेशे से एक शिक्षक थे, व्यवस्था से हतास हैं। उनका कहना है कि क्रांतिकारियों और शहीदों को आज़ादी के बाद जिस तरह उनके बलिदानों को, नामों का राजनितिक बाजार में इस्तेमाल किया गया, किया जा रहा है; उनके परिवारों को वह सम्मान नहीं मिला, जीने का मार्ग नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था। मैं साल 1957 में शिक्षक बना, टीजीटी, पीजीटी, उप-प्रधानाचार्य, प्राचार्य बना, 2006 में अवकाश प्राप्त किया। लेकिन उन परिवारों का क्या जो शिक्षित नहीं थे, या आज भी शिक्षा की किरण उनके दरवाजे तक नहीं पहुंच पायी है। यह अलग बात है कि उन शहीदों का तस्वीरें राजनीतिक मंचों पर शोभायमान रहती है। राजनेता कभी उनके घरों तक नहीं पहुंच पाते - दुखद है।

हर परिवार की अपनी एक दिल दहला देने वाली कहानी है। काकोरी षडयंत्र के मास्टरमाइंड और प्रसिद्ध क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के एक परपोते थे जिनका नाम बिजेंद्र सिंह था। आजादी के बाद, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सिफारिश पर मध्य प्रदेश सरकार ने परिवार को ज़मीन दी। लेकिन ग्रामीण भारत की अराजकता में, उस ज़मीन पर धीरे-धीरे कब्ज़ा कर लिया गया। बिजेंद्र सिंह ने बताया, "राम प्रसाद बिस्मिल के पिता मुरलीधर इस पुश्तैनी घर से उत्तर प्रदेश चले गए थे। लेकिन उनके पिता, मेरे पूर्वज, यहीं मध्य प्रदेश के चंबल जिले के अंबा गाँव में रहते थे। यही हमारा असली घर है।"
"आज़ादी के बाद, हमारे परिवार को इस गाँव में लगभग 20 एकड़ ज़मीन आवंटित की गई थी। लेकिन समय के साथ, लोगों ने धीरे-धीरे उस पर अतिक्रमण कर लिया। यहाँ तक कि जिस जगह बिस्मिल की मूर्ति स्थापित थी, उसे भी स्थानीय प्रशासन ने अपने कब्ज़े में ले लिया। हम किससे शिकायत करें? कौन सुनेगा? मैं नीना झा और शिवनाथ झा का आभारी हूँ जिन्होंने डॉ. बिंदेश्वर पाठक के माध्यम से आर्थिक मदद का इंतज़ाम किया और मेरी बेटी प्रियंका की शादी में मदद की। आज़ादी के 78 साल बाद भी शहीदों के परिवारों को उनके हक़ नहीं मिले हैं। मुझे तो यह भी नहीं पता कि सरकार किसे पेंशन देती है।"
